■बहुत दूर मत जाया करो / पाब्लो नेरूदा बहुत दूर मत जाया करो, एक दिन के लिए भी नहीं, क्योंकि — क्योंकि मैं नहीं बता सकता तुम्हें, भीतर की प्रत्यक्षानुभूति दिन काफ़ी तनता जाता है, और मैं तुम्हारी प्रतीक्षा करता हूँ इस तरह; जैसे कि किसी ख़ाली स्टेशन पर करता हूँ प्रतीक्षा — किसी और ही जगह ठहरी हुई उस रेलगाड़ी की खो दिया है जिसने, अपने गन्तव्य का होश बेवक़्त मुझे छोड़ कर कभी मत जाना, प्राण ! एक घण्टे के लिए भी नहीं, वेदनाओं का वह तुहिन कण दौड़ता है साथ, वह धुआँ जो तलाशता है अपना घर बह जाता है मेरे भीतर, भटकता हुआ इस हृदय को अवरुद्ध कर ओह ! तुम्हारा छायाचित्र कभी न घुल पाए समुद्री तटों के ऊपर तुम्हारीं पलकें कभी न फड़फड़ाएँ देखकर के यह तन्हा फ़ासले एक सैकेण्ड के लिए भी मुझे छोड़कर मत जाओ !!! क्योंकि, वह लम्हा जब तुम जा चुकी होगी मुझे छोड़कर मैं दिग्भ्रमित होकर, यह पूछता हुआ, लगाता रहूँगा पृथ्वी के ऊपर चक्कर — तुम क्या मिलोगी मुझे फिर वापिस ? या इस हालत म...
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गुरूजी स्मृति
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#स्मृति_शेष गुरूजी संस्मरण-१ 20वीं सदी का उत्तरार्ध।युगान्तकारी 80-90 का दशक। उत्तर प्रदेश के अंतिम पूर्वी छोर पर स्थित मेरा गांव।पिछड़ा इतना कि अंग्रेज भी नहीँ पहुँच पाये। ग्लोबलाईजेसन और नव-उदारवाद का दौर जब सभी क्षेत्र में निजी कम्पनियां पैर पसार रहीं थीं।छोटे-छोटे कस्बो तक प्राइवेट विद्यालय खुल रहे थे।सरकारी स्कूलों अस्ताचल की ओर जा रहे थे।बाज़ारवाद का दौर शुरू हुआ था।मुंशी जी व् पंडी जी कहलाने वाले अध्यापक "सर जी" से पदस्थापित हो रहे थे। इसी दौर में गांव के पूर्वी मुहाने पर एक आश्रम की स्थापना हुई। नाम रखा गया लोक चेतना आश्रम जो कालान्तर में क्षेत्र में गांधी आश्रम नाम से जाना जाने लगा।आश्रम की स्थापना की श्रीनारायण पाण्डेय जी ने जिनको प्यार से सभी क्षेत्रवासी गुरु जी कहते थे। मैं गाँधी जी को नहीँ देखा था पर गुरूजी को देखा था।एक छोटी सी कुटिया।।छोटा सा कद।बड़ी बड़ी मूंछें।आँख पर बड़ी सी ऐनक।खद्दर का कुरता,पायजामा और गमछा,चादर,तकिया विस्तर वगैरह सब ।वो भी स्वयं के काते हुए सूत का।पैरो में खड़ाऊ।ओजस्वी ललाट,प्रखर किन्तु सौम्य वक्तृता शैली।साफा की तरह सिर पर बांधी हुई...
विदा लेता हूं
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मेरा प्रिय महाविद्यालय आज मैं ऑफिशियली आप सब से अलग हो रहा हूं,ये अचानक से हो रहा है,ये यात्रा एक मोड़ ले रही। यहां हम सब एक प्लेटफार्म पर खड़े हैं सबकी अपने अपने गंतव्य स्थल है,सब कही न कही जायेंगे,आज या कल...जाना तो सबको है ही। हम जा रहे हैं अपने साथ तमाम कहानियां,तमाम किस्से, तमाम अधूरे किस्से जो अब कभी पूरे नहीं होंगे शायद। जब से इस व्यवस्था के हिस्सा बने तब से आज तक का पूरा दृश्य मेरे दृष्टिपटल पर चल रहा है,वो पहला दिन जब हम अजनबी जैसी आंखो से सब कुछ देख रहे थे...सब नया नया सा था, फूल पत्ते इमारतें सब बिल्कुल अनजान से थे।सारे व्यक्तित्व जो हमारे सामने थे उनसे एक अनकहा झिझक सा था।यहां तक आंखे चार करने का भी साहस नहीं जुटाना पड़ता था, निगाहें हमको हम से ही बचाती दिखती थी। नए लोग जो दोस्त बन सकते थे, नए लोग जो आदर्श बन सकते थे शायद आजीवन।सब नया नया सा था। एक ख्वाब जो मुकम्मल हो रहा था,एक जिम्मेदारी जो यहां लाई थी,एक जज्बा जो कुछ कर दिखाने का था, एक नियति (destiny)जो कहीं और भी ले जा सकती थी,सब मिल कर इस महाविद्यालय की चौकठ तक लाए थे। नए रिश्ते बने, नए आदर्श बने,जीवन की नई दिशा ...