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ना

लड़कों को सिखाएं लड़की की "ना" का सम्मान करना  ----------------------------------------------------------------- मैंने पहली बार जब 'ना' कहा  तब मैं 8 बरस की थी  "अंकल नहीं .. नहीं अंकल ' एक बड़ी चॉकलेट मेरे मुंह में भर दी अंकल ने  मेरे 'ना' को चॉकलेट कुतर कुतर कर खा गई मैं लज्जा से सुबकती रही  बरसों अंकलों से सहमती रही फिर मैंने ना कहा रोज़ ट्यूशन तक पीछा करते उस ढीठ लड़के को  ' "ना ,मेरा हाथ न पकड़ो " ना ,ना... मैंने कहा न  " ना " मैं नहीं जानती थी कि "ना "एक लफ्ज़ नहीं ,एक तीर है जो सीधे जाकर गड़ता है मर्द के ईगो में कुछ पलों बाद मैं अपनी लूना सहित औंधी पड़ी थी मेरा " ना" भी मिट्टी में लिथड़ा दम तोड़ रहा था तीसरी बार मैंने "ना" कहा अपने उस प्रोफेसर को जिसने थीसिस के बदले चाहा मेरा आधा घण्टा मैंने बहुत ज़ोर से कहा था  " ना " "अच्छा..! मुझे ना कहती है " और फिर बताया कि जानते थे वो मैं क्या- क्या करती हूँ मैं अपने बॉयफ्रेंड के साथ  अपने निजी प्रेमिल लम्हों की अश्लील व्याख्या सुनते हुए मैं खड़...

जयघोष करता आदमी

जयघोष हुआ! महाराज की जय हो! महाराज की जय हो! तूर्यनाद से सहमा भूख-प्यास से आकुल राजपथ पर घीसटता अंतिम व्यक्ति गिर पड़ा उसके हलक से चीख निकली महाराज ....? मंत्रीयों ने वाक्य पूरा किया ...की जय हो! राजा ने सुना  उसका अंतिम समय पर किया गया जयघोष। राजा ने सोचा अंतिम समय में भी  जयघोष करने वाला कितना उत्तम आदमी रहा होगा   राजा ने कहा इसे सम्मानित किया जाएगा राजा की आत्मा मर चुकी थी और उसकी देह। ✍अतुल पाण्डेय
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जो शेष बच गया शून्य नहीं था ,प्यार था.. जीवन शान्त कोलाहल का एक ज्वार था दुख की सीमा सन्तापों में सुख के अप्रतिम प्रलापो में शब्दो से विचलित भावो में सकुचे सिमटे से बाहो में सुख का झीना संसार था जो शेष बचा गया शून्य नहीं था, प्यार था.. पनघट से पनिहारीन रूठी पतझड़ में अमराई डूबी मोती ढूलक चले वनपथ पर कवि से वो कविताई छूटी सुख की दुख का अवगुन्ठन पहने जीवन का विस्तार था जो शेष बच गया शून्य  नहीं था,प्यार था.. भावों की जब मनका गूंथी शब्दों के आगे बेबस था सपनो की जब जब आहूति दी अपनो के आगे बेबस था तेरा रूक कर मुड़ जाना ही कमेरा असीम विस्तार थी जो शेष बच गया शून्य नही था, प्यार था.. वो अंधेरे की आहट थी मैं रूकता ना तो क्या करता? हाथों से अगुलियां फिसल गयी ना ठिठका होता गिर पड़ता, उन आंखो का सहज सलोनापन मेरा किञ्जित आधार था जो शेष बच गया शून्य नहीं वो प्यार था.. जीवन शान्त कोलाहल का एक ज्वार था.. शेष बच गया

खुला आसमान

________________________ उसे खुला आसमान चाहिए था फैलाने के लिए पंख मुझे बंद मुट्ठी का कोना जिसमें छिप सकूं  दुनिया के झंझवातो से सुदूर घुप्प अंधकार में  उसे चाहिए थी माघ की गुनगुनी धूप जहाँ करवट ले सके अल्हड़पन  मुझे चाहिए था साँसो का कारोबार ताकि भर सकूं निश्चेष्ट लोगों की साँसे जो मसले हुए हैं खुद की लाशों तले उसे चाहिए था बेमौसम की बरसात  जिसमें भींगो दे अपने सभी अनकहे सूखे जज्बात बिखेर दे दुख मे पगी हुई खुशियाँ  मिट्टी की सोंधी सुगंध के वास्ते मुझे चाहिए था  सभी सितारों की रौशनी जिससे भर दूं दुनिया के पृष्ठ में छिपे अंधेरों में जहाँ जमा की जा रही मक्कारियां उसे चाहिए था परिजात के फूलों की माला जिसे पहनाती अपने प्रियवर को अनायास ही उसके वक्षस्थल पर रखकर माथा मुझे चाहिए था  उन करोड़ों भूखे पेटों की आंच जिसमें गलाता पैरों की बेड़ियां  और ढालता अनगिनत सुनहरे सपने  उसे पंसद था रात्रि के तीसरे पहर में  सप्तम सुर मे विलापता वैरागी मुझे पसंद थी खारे चेहरे लिए  वियोगी के प्रेम में पगी स्त्रियां  हम मिले अनायास व सहज ही क्षितिज और आस...

शहरीकरण

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       शहर उतरता है टी वी फिल्मों के रास्ते गाँव में घुलता जाता शनैः शनैः रक्त में  किसी हार्मोन की तरह दिखाता कंक्रीट की वादियों का सब्जबाग जिनमें है कुछ उड़ती हुई सेल्फियाँ  कुछ एक सन्नाटे को शोर है बहुमंजिली इमारतों में जड़े सितारों की लड़िया,  जिनके पाँव को वक़्त नहीं  कि नाप ले दहलीज अपने अस्तित्व की। चिड़ियों की चहचहाहाट को चीरता  दैत्यनुमा गाड़ियों का कर्कश शोर गमलों में सिमटते बरगद की छाँव  सड़कों की रफ्तार से पीछे छूटते गाँव अब हर घरों में शहर बस रहे हैं .. सम्बन्धों के नये आयाम  शहरी परम्पराओं की आरोपित आवृत्ति  'सब कुछ बिकता है' की निर्लज्ज प्रवृत्ति  समय की निकटता सम्बन्धों की दूरी  हरा मुखौटा पहने शहर खुलकर विहँस रहे हैं .. अब शहर गाँवों में उतर रहे हैं .. ✍ अतुल पाण्डेय