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Showing posts from June, 2026

डायरी

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इरफान खान याद आते हैं जिन्होंने कहा था कि आखिर में सब कुछ छोड़ देने का ही नाम जिंदगी है....। कितनी बोझिल होती जा रही हैं शामें. सुबहे होती हैं, दिन चढ़ता है शाम होती है फिर रात हो जाती है। धीरे धीरे सब छूटता जा रहा, इरफान खान याद आते हैं जिन्होंने कहा था कि आखिर में सब कुछ छोड़ देने का ही नाम जिंदगी है....। कितनी बोझिल होती जा रही हैं शामें। सुबहे होती हैं, दिन चढ़ता है शाम होती है फिर रात हो जाती है। धीरे धीरे सब छूटता जा रहा। जो सबसे प्रिय थे वो सबसे दूर हुए। जिनका अस्तित्व मेरे अन्दर गुंथा हुआ था पता नहीं कब के वे  निकल गए थे, अचानक से लगा कि वे हैं ही नहीं।  जिनकी एक एक बात मायने रखती थी, अब उनके होने न होने के ही मायने नहीं हैं। जिनसे घण्टों बातें हो जाए तो भी मन नहीं भरता था उनसे सेकेण्डों में ही बातें खतम हो जाती हैं। डायल नम्बर के रहने वाले नम्बर कॉन्टैक्ट लिस्ट में कहीं पड़े हैं। जिनके दुःख मेरे दुःख थे,उनके दुःख मुझे छू तो लेते हैं पर दुःखी नहीं कर पाते। जिनसे मिलने के लिए बहाने ढूंढता नहीं पड़ता था वाजिब कारण होते थे,वे मिल जाते हैं तो एक बहाने गढ़ लिए ज...

संवाद (कविता)

- स-संवाद ------------------- १- मैंने पूछा सबसे मुलायम क्या है? उसने कहा स्त्री का मन मैंने फिर पूछा और सबसे मजबूत? उसने कहा स्त्री का मन २- मैंने कहा प्रतीकों, उदाहरणों, और संदर्भों में बात करना भी कितना सुंदर है ना? उसने मुझे कुछ नहीं कहा बस हल्के से छुआ बिना किसी प्रतीक, उदाहरण, और संदर्भ के! ३- मैंने पूछा तितली अधिक सुंदर है या फूल? उसने कहा उनका मिलना ४- मैंने पूछा? इस समस्त ब्रम्हांड का केंद्र कहाँ है? उसने कहा हमारी यह पृथ्वी तो फिर पृथ्वी का? हर वो जगह जहाँ स्त्री है अच्छा तो फिर स्त्री का? उसने कहा उसकी नाभि ५- मैंने पूछा सबसे सुंदर संगीत? उसने कहा मौन मैंने पूछा सबसे दुर्लभ राग? उसने कहा प्रेम मैंने पूछा सबसे बड़ा सुख? उसने कहा अतृप्ति मैंने पूछा सबसे पहला संबंध? उसने कहा दृष्टि  मैंने पूछा ईश्वर कौन है? उसने थोड़ा ठहर कर मुझे देखा और फिर मुस्कुरा कर कहा  यह घड़ी, यह पल, यह क्षण। --

अनाधिकार चेष्टा और प्रायश्चित

आज तुम बैंक गई थीं, बैंक खाते से लिंक फ़ोन नंबर बदलवाने के लिए। मैं हमेशा तुम्हें प्रेरित करता रहा हूँ कि इस तरह के काम स्वयं करने की आदत डालो—चाहे बैंक का काम हो, कोई फ़ॉर्म भरना हो या कहीं प्रवेश लेना हो। यह अच्छी बात होती है कि हम ऐसे कार्यों के लिए किसी अन्य व्यक्ति पर निर्भर न रहें। मेरी आदत रही है कि प्रत्येक लड़की—चाहे वह मेरी मित्र हो, संबंधी हो या मेरी छात्रा—उसे अपना काम स्वयं करने के लिए प्रेरित करूँ। एक बार फ़ॉर्म भरने को लेकर भी तुमसे बहस हो गई थी। मुझे तनिक भी अच्छा नहीं लगता कि स्त्रियाँ इन कार्यों के लिए पुरुषों पर आश्रित रहें। किसी आपात स्थिति में उन्हें कठिनाई का सामना न करना पड़े और वे अपना काम स्वयं करके आत्मगौरव का अनुभव कर सकें। भले वे स्वयं न करें, पर कम से कम उन्हें यह तो पता होना चाहिए कि ये सब काम कैसे होते हैं। वे लोगों से मिलें, उनसे बात करें, और आवश्यकता पड़ने पर अपना काम कह सकें। मैं हमेशा इस दिशा में उनकी सहायता भी करता हूँ। आज मुझे एक नया सबक मिला। जब तुम बैंक में थीं, तब मैंने तुम्हें फ़ोन किया था और एक काम दिया था कि पता करके आना कि सेविंग अकाउंट को...

मूंछें

मेरे पिता की ऊँची नाक थी इतनी ऊँची कि चाय के गिलास में डूब जाया करती थी जिन पर हँस पड़ती थी  घर की बच्चियाँ,  उनके पिता की भी नाक भी ऊँची थी ऐसा दादी बताती हैं, जिनके रौबदार मूंछो से बिना डरे घर की बच्चियाँ खेलती थी बचपन में बच्चियाँ बड़ी होती गईं  उनके साथ साथ बढ़ती गई उनकी मूंछे भी मूंछें बढ़ती गई जैसे बढ़ती है अमरबेल  बच्चियां बढ़ कर लड़कियां हो गईं  और मूंछें बढ़ कर इज्ज़त   मूंछें बरगद बनी जिसके नीचे पली किसी पीले पौधे के जैसे बच्चियाँ  अपने हिस्से का आकाश ढूंढ रहीं आज भी

the wait

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मैंने कभी एक फिल्म देखी थी,उसकी कहानी अच्छे से याद नहीं आ रही थी, उसमें एक प्रेग्नेंट लड़की और एक बूढ़ा आदमी थे। शायद वे एक बस स्टॉप पर मिले थे, बुजुर्ग व्यक्ति को लास्ट में लड़की लेकर बस से चली जाती है। बड़ा भावुक सा दृश्य था।बस  कहां ले गई उनको? आज मुझे याद आया कि कौन सी फिल्म थी,कब देखा था... उस लड़की की क्या कहानी थी ? क्यों दुखी थी। मन बेचैन हो गया। बहुत सोचा पर याद नहीं आया फिर मैने दिमाग पर जोर डाला कि उसका नाम याद आए तो उसे फिर देखूं फिर अंततः चैटजीपीटी की शरण में गया ... वहां भी बहुत देर यही प्लॉट डाल कर खोजा पर नहीं मिला... मुझे पता नहीं क्यों लग रहा था कि या तो ये काफ्का की कहानी है या कोई रशियन कहानी या फिल्म है। अलग अलग prompt देकर खोजा, इसी चक्कर में मेटामोर्फोसिस जैसी कालजयी कहानी फिर से पढ़ गया ,बहुत मुश्किल से इसने खोजा कि यह एक शॉर्ट फिल्म सह मानसिक रोग जैसे आटिज्म, डिमेंशिया जागरूकता अभियान से संबंधित थी। और नाम था The wait... फिर देखा इसे तल्लीनता से। पूरी कहानी कुछ इस प्रकार है कि एक गर्भवती महिला बस स्टॉप पर बैठी है। चेहरे पर चिंता साफ़ दिख रही है।...