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संवाद (कविता)

- स-संवाद ------------------- १- मैंने पूछा सबसे मुलायम क्या है? उसने कहा स्त्री का मन मैंने फिर पूछा और सबसे मजबूत? उसने कहा स्त्री का मन २- मैंने कहा प्रतीकों, उदाहरणों, और संदर्भों में बात करना भी कितना सुंदर है ना? उसने मुझे कुछ नहीं कहा बस हल्के से छुआ बिना किसी प्रतीक, उदाहरण, और संदर्भ के! ३- मैंने पूछा तितली अधिक सुंदर है या फूल? उसने कहा उनका मिलना ४- मैंने पूछा? इस समस्त ब्रम्हांड का केंद्र कहाँ है? उसने कहा हमारी यह पृथ्वी तो फिर पृथ्वी का? हर वो जगह जहाँ स्त्री है अच्छा तो फिर स्त्री का? उसने कहा उसकी नाभि ५- मैंने पूछा सबसे सुंदर संगीत? उसने कहा मौन मैंने पूछा सबसे दुर्लभ राग? उसने कहा प्रेम मैंने पूछा सबसे बड़ा सुख? उसने कहा अतृप्ति मैंने पूछा सबसे पहला संबंध? उसने कहा दृष्टि  मैंने पूछा ईश्वर कौन है? उसने थोड़ा ठहर कर मुझे देखा और फिर मुस्कुरा कर कहा  यह घड़ी, यह पल, यह क्षण। --

अनाधिकार चेष्टा और प्रायश्चित

आज तुम बैंक गई थीं, बैंक खाते से लिंक फ़ोन नंबर बदलवाने के लिए। मैं हमेशा तुम्हें प्रेरित करता रहा हूँ कि इस तरह के काम स्वयं करने की आदत डालो—चाहे बैंक का काम हो, कोई फ़ॉर्म भरना हो या कहीं प्रवेश लेना हो। यह अच्छी बात होती है कि हम ऐसे कार्यों के लिए किसी अन्य व्यक्ति पर निर्भर न रहें। मेरी आदत रही है कि प्रत्येक लड़की—चाहे वह मेरी मित्र हो, संबंधी हो या मेरी छात्रा—उसे अपना काम स्वयं करने के लिए प्रेरित करूँ। एक बार फ़ॉर्म भरने को लेकर भी तुमसे बहस हो गई थी। मुझे तनिक भी अच्छा नहीं लगता कि स्त्रियाँ इन कार्यों के लिए पुरुषों पर आश्रित रहें। किसी आपात स्थिति में उन्हें कठिनाई का सामना न करना पड़े और वे अपना काम स्वयं करके आत्मगौरव का अनुभव कर सकें। भले वे स्वयं न करें, पर कम से कम उन्हें यह तो पता होना चाहिए कि ये सब काम कैसे होते हैं। वे लोगों से मिलें, उनसे बात करें, और आवश्यकता पड़ने पर अपना काम कह सकें। मैं हमेशा इस दिशा में उनकी सहायता भी करता हूँ। आज मुझे एक नया सबक मिला। जब तुम बैंक में थीं, तब मैंने तुम्हें फ़ोन किया था और एक काम दिया था कि पता करके आना कि सेविंग अकाउंट को...

मूंछें

मेरे पिता की ऊँची नाक थी इतनी ऊँची कि चाय के गिलास में डूब जाया करती थी जिन पर हँस पड़ती थी  घर की बच्चियाँ,  उनके पिता की भी नाक भी ऊँची थी ऐसा दादी बताती हैं, जिनके रौबदार मूंछो से बिना डरे घर की बच्चियाँ खेलती थी बचपन में बच्चियाँ बड़ी होती गईं  उनके साथ साथ बढ़ती गई उनकी मूंछे भी मूंछें बढ़ती गई जैसे बढ़ती है अमरबेल  बच्चियां बढ़ कर लड़कियां हो गईं  और मूंछें बढ़ कर इज्ज़त   मूंछें बरगद बनी जिसके नीचे पली किसी पीले पौधे के जैसे बच्चियाँ  अपने हिस्से का आकाश ढूंढ रहीं आज भी

the wait

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मैंने कभी एक फिल्म देखी थी,उसकी कहानी अच्छे से याद नहीं आ रही थी, उसमें एक प्रेग्नेंट लड़की और एक बूढ़ा आदमी थे। शायद वे एक बस स्टॉप पर मिले थे, बुजुर्ग व्यक्ति को लास्ट में लड़की लेकर बस से चली जाती है। बड़ा भावुक सा दृश्य था।बस  कहां ले गई उनको? आज मुझे याद आया कि कौन सी फिल्म थी,कब देखा था... उस लड़की की क्या कहानी थी ? क्यों दुखी थी। मन बेचैन हो गया। बहुत सोचा पर याद नहीं आया फिर मैने दिमाग पर जोर डाला कि उसका नाम याद आए तो उसे फिर देखूं फिर अंततः चैटजीपीटी की शरण में गया ... वहां भी बहुत देर यही प्लॉट डाल कर खोजा पर नहीं मिला... मुझे पता नहीं क्यों लग रहा था कि या तो ये काफ्का की कहानी है या कोई रशियन कहानी या फिल्म है। अलग अलग prompt देकर खोजा, इसी चक्कर में मेटामोर्फोसिस जैसी कालजयी कहानी फिर से पढ़ गया ,बहुत मुश्किल से इसने खोजा कि यह एक शॉर्ट फिल्म सह मानसिक रोग जैसे आटिज्म, डिमेंशिया जागरूकता अभियान से संबंधित थी। और नाम था The wait... फिर देखा इसे तल्लीनता से। पूरी कहानी कुछ इस प्रकार है कि एक गर्भवती महिला बस स्टॉप पर बैठी है। चेहरे पर चिंता साफ़ दिख रही है।...
प्रेम तुम्हे यदि सुन्दर और बेहतर मनुष्य नहीं बनाता है तो वह सबकुछ है पर प्रेम नहीं है,यह पंक्ति मैंने कहीं पढ़ी थी। मैं यह दावे के साथ कहता हूं कि तुम्हारे साथ मैं बेहतर मनुष्य हुआ। तुमने मुझे हृदय से चाहा सराहा और मेरी कटु वचनों, उलाहनाओं को सुना और सहा फिर भी मुझे हमेशा खुश रखने का प्रयास किया, मैंने इसकी परवाह शायद ही कभी की।  किसी को प्यार करना तुम्हें निर्मल और कारुणिक बनाता है पर किसी का प्यार पाना तुम्हें पवित्र और जिम्मेदार बनाता है। मैं सौभाग्यशाली हूँ कि मैंने तुम्हारा प्यार पाया। मैं तुम्हें कितना प्रेम करता हूँ या नहीं करता हूँ ये तुम पर छोड़ता हूँ फिर भी इतना तो सच है कि मैं तुम्हारी परवाह करता हूँ ,जीवन के उन कठिन क्षणों के प्रति आगाह करता हूँ जो मैंने लड़कियों के जीवन में देखें हैं... मेरी तो यही आकांक्षा रहेगी कि ताउम्र ऐसे कठिन पल तुम्हारे जीवन में न आएं और मेरी आशंकाएं गलत साबित हों। स्वभाव से विद्रोही हूँ, समाज के इस बने बनाए ढांचे से मुझे अनेक शिकायतें रही हैं जो कभी कभी अनायास ही फूट पड़ती हैं जबकि तुम्हारा इसमें कोई दोष नहीं होता है। जानते हो जब हम किसी से नफर...
हंसते हंसते कहीं चुप हो जाता हूँ मैं... बात शुरू होती हाल चाल से, फिर बातें घर परिवार पर आती हैं। भइया ये कह रहे y, दीदी ये कह रही थे....पापा इस बात पर क्रोधित थे, मम्मी इस बात पर चिंतित थी। इन्हीं बातों के गुच्छों में, मेरी अपनी बातें आती हैं, मेरे अनुभव आते हैं जिनके वज़ह से कभी कभी कड़वाहट भरी आलोचनाएं भी सामने आती हैं। फ़िर दोनों " मैं "में उलझते हैं.... कि मैं ऐसा या मेरे घर ऐसा होता है। फिर उसमें से ही कोई बात चुभ जाती है किसीको।इसके बाद लड़ाईयां झगड़े हो जाते हैं। इसके बाद शुरू होता है चुप्पियों का दौर... लम्बे लम्बे बिल्कुल paused calls.. जिसमें होता है हूँ, हाँ, और सब, ठीक है, बढ़िया... क्योंकि मेरी शब्द निरस्त हो जाते हैं जब मुझे अपनी भावनाएं व्यक्त करनी हों ,.. मुझे अपने दुःख खुशी प्रेम व्यक्त करने के लिए शब्द नहीं होते,उनके पास ये कला है, उन्हें दुनिया की बातों से कोई मतलब नहीं.. उन्हें अपनी या अपने लोगों की बातों से मतलब होता है, जिसमें मैं भी हूँ। मेरा मूड किसी नेता अभिनेता या किसी अधिकारी के बेहूदा बयान पर दिन भर के लिए खराब हो सकता है,उनका मूड किसी फूल के खिल ...

पति की प्रेमिका

------------------- उस दिन पति के ऑफिस के गेट टूगेदर में मिली थी अनुपमा  मल कॉटन की गुलाबी साड़ी पहने खूब सुंदर लग रही थी मैं दूर बैठी देख रही थी अपने पति की प्रेमिका को । पहले एक बार मिले हैं हम  कांत ने ही मिलवाया था जब अचानक टकरा गयी थी अपने पति के साथ एक कैफे में  नेवी ब्लू मिडी ड्रेस पहने हुए तब कहाँ जानती थी मैं कि यह मेरे पति की प्रेमिका है फिर एक रोज़ कांत की वाट्सएप चैट पढ़ ली गलती से तब तो जान पाई कि  मेरा कांत दो सालों से किसी अनु का नील भी है।  तब मन तो बहुत किया कि घर में तूफान खड़ा कर दूं और इस अनु के घर भी जाकर तमाशा कर दूं  फिर जी चाहा कि कांत को छोड़ कर चली जाऊं  या उसे ही जाने को कह दूं घर से  ठंडे दिमाग से यह भी सोचा कि समझदारी से कांत से बात करूं ।  फिर जाने क्यों चुप रहना चुना कह देने से उससे प्रेम करना तो बंद करेगा नहीं अलबत्ता और सतर्क हो जाएगा या रिश्ता तोड़ भी ले तब भी मन से कैसे निकालेगा उसे?  और फिर कांत इतना ज्यादा कांत था मेरे साथ कि अगर गलती से पता नहीं चलता तो यह बात शायद मैं कभी न जान पाती कांत का मेरे प्रति ना ...