मासिक परीक्षा

पिछले वर्ष, शिक्षा विभाग ने मासिक परीक्षाओं की एक महत्वाकांक्षी योजना लागू की थी, जिसका उद्देश्य छात्रों की शैक्षिक प्रगति को नियमित रूप से आँकना था। इसके तहत प्रत्येक कक्षा और विषय के लिए बोर्ड परीक्षा की तर्ज पर प्रश्न पत्र तैयार किए जाते थे। इन प्रश्न पत्रों को जिला स्तर से सभी स्कूलों तक पहुँचाने की व्यवस्था थी, लेकिन यह प्रक्रिया कई चुनौतियों और अव्यवस्थाओं से भरी थी, जिसने शिक्षकों, छात्रों, और स्कूलों के लिए कई कठिनाइयाँ पैदा कीं।प्रश्न पत्रों को जिला मुख्यालय से स्कूलों तक पहुँचाने की जिम्मेदारी शिक्षकों पर डाल दी गई थी। ये पेपर जिला स्तर से भेजे नहीं जाते थे; इसके बजाय, शिक्षकों को स्वयं जिला कार्यालय जाकर इन्हें लेना पड़ता था। यह कार्य अत्यंत श्रमसाध्य और समय लेने वाला था। शिक्षकों के सामने यह सवाल रहता था कि कौन जाए और कौन पेपर लाए। कई बार प्रधानाध्यापक स्वयं इस जिम्मेदारी को निभाते, तो कभी अन्य शिक्षकों को भेजा जाता। इस प्रक्रिया में शिक्षकों को कई समस्याओं का सामना करना पड़ता था। जिला कार्यालय में प्रश्न पत्रों के पैकेट अव्यवस्थित ढंग से रखे जाते थे। स्कूल-विशिष्ट पैकेट ढूँढना और उनकी पहचान करना एक जटिल कार्य था। शिक्षकों को बड़े-बड़े पैकेटों को हटाकर, लेबल पढ़कर और सत्यापन के बाद उन्हें मोटरसाइकिल पर लादकर स्कूल लाना पड़ता था, जो गर्मी और धूल भरी सड़कों पर एक दुष्कर कार्य था। कुछ शिक्षकों ने बताया कि जिला कार्यालय के कर्मचारियों को छोटी-मोटी राशि देकर पेपर प्राप्त करना आसान हो जाता था, लेकिन यह भी हमेशा संभव नहीं था। कई बार गलत पैकेट ले लिए जाते या किसी अन्य स्कूल का पैकेट चला जाता, जिससे अव्यवस्था और देरी होती।जब कोई शिक्षक पेपर लेने जाता, तो उसकी कक्षाएँ अन्य शिक्षकों को संभालनी पड़तीं। इससे शिक्षकों पर दोहरा बोझ पड़ता—पढ़ाने और प्रशासनिक कार्यों का। स्कूलों में पहले से ही कर्मचारियों की कमी थी, जिसके कारण यह जिम्मेदारी और भारी हो जाती थी। प्रत्येक प्रश्न पत्र में 25 वस्तुनिष्ठ (MCQ) और 25 व्यक्तिपरक प्रश्न होते थे। OMR शीट्स की जाँच के लिए मशीनें उपलब्ध नहीं थीं, इसलिए शिक्षकों को इन्हें मैन्युअल रूप से जाँचना पड़ता था। व्यक्तिपरक प्रश्नों की जाँच में और समय लगता। शिक्षा सचिव के निर्देशानुसार, महीने के अंतिम पाँच दिन परीक्षा और अगले पाँच दिन मूल्यांकन में व्यतीत होते। शिक्षक कॉपियाँ घर ले जाना नहीं चाहते थे, क्योंकि स्कूल का समय सुबह 9 से शाम 5 बजे तक था। स्कूल में कॉपियाँ जाँचने से कक्षाएँ खाली रहतीं, जिससे बच्चे इधर-उधर घूमकर हंगामा करते।छात्रों के लिए भी यह प्रणाली कई मायनों में अनुचित थी। स्कूलों में संसाधनों की कमी के कारण परीक्षा का माहौल आदर्श नहीं था। कई स्कूलों में कमरों की कमी थी। गर्मी और भीड़ के बीच, बच्चों को एक-दूसरे के पास बैठाना पड़ता था। इससे नकल को रोकना असंभव हो जाता था। दूर-दूर बैठाने के लिए न तो पर्याप्त बेंच थीं, न ही जगह। यूट्यूब और अन्य सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर परीक्षा से पहले ही प्रश्न पत्र और उनके हल उपलब्ध हो जाते थे। कई बच्चे इन उत्तरों को रटकर या कागज पर लिखकर लाते और चुपके से कॉपी में लिख लेते। भीड़भाड़ वाले कमरों में, जहाँ एक बेंच पर तीन-चार बच्चे बैठते थे, नकल रोकना शिक्षकों के लिए असंभव था। नकल के कारण कम मेहनत करने वाले और अनुशासनहीन बच्चे अधिक अंक प्राप्त करते, जबकि मेहनती और ईमानदार बच्चे कम अंक पाते। इससे न केवल छात्रों का मनोबल टूटता, बल्कि शिक्षा की गुणवत्ता पर भी सवाल उठते। मेहनती छात्रों को लगता कि उनकी मेहनत का कोई मूल्य नहीं, जिससे उनमें निराशा बढ़ती।इस पूरी प्रक्रिया में संसाधनों की कमी एक प्रमुख बाधा थी। अधिकांश स्कूलों में पर्याप्त कक्षाएँ और बैठने की व्यवस्था नहीं थी। इससे बच्चों को असुविधाजनक परिस्थितियों में परीक्षा देनी पड़ती थी। स्कूलों में पहले से ही शिक्षकों और सहायक कर्मचारियों की कमी थी। अतिरिक्त प्रशासनिक कार्यों, जैसे पेपर लाना और कॉपियाँ जाँचना, ने शिक्षकों पर बोझ बढ़ा दिया। OMR शीट्स की जाँच के लिए स्वचालित मशीनें उपलब्ध नहीं थीं। प्रश्न पत्रों के डिजिटल वितरण या मूल्यांकन की कोई व्यवस्था नहीं थी, जिससे प्रक्रिया और जटिल हो जाती थी। जिला स्तर पर प्रश्न पत्रों का प्रबंधन अव्यवस्थित था। पैकेटों की छँटाई और लेबलिंग में कमी के कारण शिक्षकों को घंटों मेहनत करनी पड़ती थी।यह स्थिति शिक्षकों और छात्रों दोनों के लिए निराशाजनक थी। शिक्षक लंबे समय तक काम करने, गर्मी और धूल में यात्रा करने, और अव्यवस्थित प्रणाली से जूझने के बावजूद यह देखकर दुखी होते कि नकल के कारण उनकी मेहनत बेकार जा रही थी। दूसरी ओर, ईमानदार छात्रों को लगता कि उनकी मेहनत का कोई फल नहीं मिल रहा। यह प्रणाली, जो मूल रूप से शैक्षिक सुधार के लिए बनाई गई थी, संसाधनों की कमी और खराब प्रबंधन के कारण अपनी विश्वसनीयता खो रही थी।

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