Posts

Showing posts with the label सुशोभित

शेखर एक जीवनी

किशोरवय का मन यदि अबोध और अभिमानी हो तो किसी तरुणी की मूर्ति बनाकर उसकी उपासना करने लगता है फिर वह बहिन हो या सखी (किन्तु यह तो अब विगत सदी की बात हो गई क्योंकि इस सदी ने अबोध-तत्व की जैसे हत्या की है उसने तो आत्मा का मानचित्र ही बदल दिया है!) परन्तु वैसा क्यों होता था? क्योंकि देह में दुर्निवार चाहना की गूंज चली आई है, उसके वलय जगने लगे हैं, किन्तु बुद्धि अभी उसकी व्याख्या नहीं कर सकती है। अभी वह इतनी वयस्क नहीं हुई। वयस्क शब्द में ही वय है! हृदय में एक हाहाकार उठता है जो उसको मथ डालता है। किशोरवय का मन यदि अबोध होने के साथ ही अभिमानी भी हो तो उस ज्वार की व्याख्या एक ऐसी आसक्ति की तरह करता है जो सांसारिक नहीं अपार्थिव है। किसी तरुणी को वह अपने हृदय की सम्राज्ञी बनाकर पूजने लगता है और अगर उसको भनक भी लग जाए कि उसका वो व्यक्ति-विग्रह निरा नश्वर है, तो आत्महंता अवसाद से वह घिर जायेगा। अपनी उपास्य को वह कभी शशि कहेगा, कभी शारदा, कभी सरस्वती, किन्तु वह उसकी प्रतीक्षा करेगा, उसकी प्रतिमा को परिष्कृत करेगा, कभी पुष्पों से उसको सजाने का उद्यम, किन्तु अपनी उस प्राणमूर्ति के बिना जी नहीं सकेगा।...