डायरी
इरफान खान याद आते हैं जिन्होंने कहा था कि आखिर में सब कुछ छोड़ देने का ही नाम जिंदगी है....।
कितनी बोझिल होती जा रही हैं शामें. सुबहे होती हैं, दिन चढ़ता है शाम होती है फिर रात हो जाती है। धीरे धीरे सब छूटता जा रहा, इरफान खान याद आते हैं जिन्होंने कहा था कि आखिर में सब कुछ छोड़ देने का ही नाम जिंदगी है....।
कितनी बोझिल होती जा रही हैं शामें। सुबहे होती हैं, दिन चढ़ता है शाम होती है फिर रात हो जाती है। धीरे धीरे सब छूटता जा रहा।
जो सबसे प्रिय थे वो सबसे दूर हुए। जिनका अस्तित्व मेरे अन्दर गुंथा हुआ था पता नहीं कब के वे निकल गए थे, अचानक से लगा कि वे हैं ही नहीं।
जिनकी एक एक बात मायने रखती थी, अब उनके होने न होने के ही मायने नहीं हैं।
जिनसे घण्टों बातें हो जाए तो भी मन नहीं भरता था उनसे सेकेण्डों में ही बातें खतम हो जाती हैं।
डायल नम्बर के रहने वाले नम्बर कॉन्टैक्ट लिस्ट में कहीं पड़े हैं।
जिनके दुःख मेरे दुःख थे,उनके दुःख मुझे छू तो लेते हैं पर दुःखी नहीं कर पाते।
जिनसे मिलने के लिए बहाने ढूंढता नहीं पड़ता था वाजिब कारण होते थे,वे मिल जाते हैं तो एक बहाने गढ़ लिए जाते हैं।
जिनके बारे में अनुमान लगाना इतना आसान लगता था जितना अपने बारे में बात करना,पास से आ भी जाते हैं तो चौंक जाते हैं कि कौन?
जो दुश्मन जैसे लगते थे वे थोड़े कम दुश्मन लगते हैं,वे लोग जिनको नजरअंदाज किया वे भी भले जान पड़ते हैं।
जो अभिनेता पसंद थे, वे भांट हो गए ।
कविताएं लिखना और पढ़ना दोनों पसंद था,अब दोनों नहीं रहा। प्रिय कवियों ने राजाश्रय ले लिया, मेरी लेखनी मेरे मालिक ने गिरवी रख ली।
जेब की अंतिम सिक्के भी किताबे खरीदने में खर्च करने का मन होता पर सिक्के ही नहीं होते,आज जेब में सिक्के हैं पर किताबें उलट पुलट के रख देता हूँ।
जो सबसे प्रिय थे वो सबसे दूर हुए। जिनका अस्तित्व मेरे अन्दर गुंथा हुआ था पता नहीं कब के वे निकल गए थे, अचानक से लगा कि वे हैं ही नहीं।
जिनकी एक एक बात मायने रखती थी, अब उनके होने न होने के ही मायने नहीं हैं।
जिनसे घण्टों बातें हो जाए तो भी मन नहीं भरता था उनसे सेकेण्डों में ही बातें खतम हो जाती हैं।
डायल नम्बर के रहने वाले नम्बर कॉन्टैक्ट लिस्ट में कहीं पड़े हैं।
जिनके दुःख मेरे दुःख थे,उनके दुःख मुझे छू तो लेते हैं पर दुःखी नहीं कर पाते।
जिनसे मिलने के लिए बहाने ढूंढता नहीं पड़ता था वाजिब कारण होते थे,वे मिल जाते हैं तो एक बहाने गढ़ लिए जाते हैं।
जिनके बारे में अनुमान लगाना इतना आसान लगता था जितना अपने बारे में बात करना,पास से आ भी जाते हैं तो चौंक जाते हैं कि कौन?
जो दुश्मन जैसे लगते थे वे थोड़े कम दुश्मन लगते हैं,वे लोग जिनको नजरअंदाज किया वे भी भले जान पड़ते हैं।
जो दोस्त थे कुछ बहुत पैसे वाले हो गए,कुछ बीबी बच्चों वाले और कुछ ' सम्पर्क ' में बदल गए।
जो अभिनेता पसंद थे, वे भांट हो गए।
कुछ लेखक जो पसन्द थे वे मेरी निष्ठा बेच दिए व्यापारियों को।
कुछ लोगों के पास मेरे लिए समय था, वे अपना समय बेच कर पेट पाल रहे, ऐसा वे कहते हैं।
कविताएं लिखना और पढ़ना दोनों पसंद था,अब दोनों नहीं रहा। प्रिय कवियों ने राजाश्रय ले लिया, मेरी कलम मेरे मालिक ने गिरवी रख ली।
जेब की अंतिम सिक्के भी किताबे खरीदने में खर्च करने का मन होता पर सिक्के ही नहीं होते,आज जेब में सिक्के हैं पर किताबें उलट पुलट के रख देता हूँ।
और मैं ये सब देखने , सुनने और समझने के लिए अभिशप्त हूँ।
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