अनाधिकार चेष्टा और प्रायश्चित

आज तुम बैंक गई थीं, बैंक खाते से लिंक फ़ोन नंबर बदलवाने के लिए। मैं हमेशा तुम्हें प्रेरित करता रहा हूँ कि इस तरह के काम स्वयं करने की आदत डालो—चाहे बैंक का काम हो, कोई फ़ॉर्म भरना हो या कहीं प्रवेश लेना हो। यह अच्छी बात होती है कि हम ऐसे कार्यों के लिए किसी अन्य व्यक्ति पर निर्भर न रहें।

मेरी आदत रही है कि प्रत्येक लड़की—चाहे वह मेरी मित्र हो, संबंधी हो या मेरी छात्रा—उसे अपना काम स्वयं करने के लिए प्रेरित करूँ। एक बार फ़ॉर्म भरने को लेकर भी तुमसे बहस हो गई थी।

मुझे तनिक भी अच्छा नहीं लगता कि स्त्रियाँ इन कार्यों के लिए पुरुषों पर आश्रित रहें। किसी आपात स्थिति में उन्हें कठिनाई का सामना न करना पड़े और वे अपना काम स्वयं करके आत्मगौरव का अनुभव कर सकें। भले वे स्वयं न करें, पर कम से कम उन्हें यह तो पता होना चाहिए कि ये सब काम कैसे होते हैं। वे लोगों से मिलें, उनसे बात करें, और आवश्यकता पड़ने पर अपना काम कह सकें। मैं हमेशा इस दिशा में उनकी सहायता भी करता हूँ।

आज मुझे एक नया सबक मिला। जब तुम बैंक में थीं, तब मैंने तुम्हें फ़ोन किया था और एक काम दिया था कि पता करके आना कि सेविंग अकाउंट को सैलरी अकाउंट में कैसे बदला जाता है। मैंने जान-बूझकर तुम्हें यह कार्य दिया था ताकि तुम्हारे भीतर की झिझक समाप्त हो।

यह बात सच है कि तुम्हें इस प्रकार के काम करने में या अपरिचित लोगों से मिलने-जुलने में, उनसे अपना कोई काम कहने में असहजता होती है। मैंने तुम्हारी बहुत सी झिझकें तोड़ी हैं। तुम्हे बहुत कुछ सिखाया भी है, तुम भी ये बात मानती हो, थोड़ा बड़ा हूं, तो थोड़ी सी दुनिया भी अधिक देखा हूँ।

तुमसे बहुत सी बातें मैने सीखी भी हैं, ये तुम्हारी देन है कि मैं भावना के स्तर पर और संवेदनशील हुआ हूँ।

हम दोनों ने एक दूसरे के व्यक्तित्व को और विकसित करने में सहायता की है।

वापस आने पर मैंने तुम्हें झिड़क दिया। तुम किन्हीं कारणों से यह जानकारी नहीं ले पाई थीं। मैंने तंज कसते हुए कह दिया कि तुम आवेदन लिखने के लिए एक ए-4 आकार का कागज़ तक नहीं माँग सकती, यहाँ तक कि किसी से एक पेन भी नहीं माँग सकती, भले उसके लिए तुम्हें एक किलोमीटर पैदल चलकर उसे खरीदना पड़े।

हालाँकि मेरा उद्देश्य न तुम्हें दुःख पहुँचाना था, न तुम्हारा अपमान करना और न ही तुम्हें नीचा दिखाना।

मुझे लगा था कि तुम हमेशा की तरह थोड़ा बहस करोगी, कहोगी कि ऐसा थोड़े ही है, ये सब तो मैं कर ही सकती हूँ, मैं इतनी भी बेवकूफ़ नहीं हूँ। फिर हम दोनों हँस देंगे और बात वहीं समाप्त हो जाएगी। लेकिन तुम्हें क्रोध आ गया। पहली बार मेरे लिए तुम्हारे मुँह से एक खराब शब्द भी निकला। तुम बहुत अधिक आहत हो गई थीं।

तुम मुझ पर बिफर पड़ीं कि मैं तुम्हारे प्रयासों की सराहना नहीं करता, तुम्हारे छोटे-छोटे प्रयासों से मुझे कभी खुशी नहीं मिलती, मैं हमेशा तुममें कमी निकालता रहता हूँ, तुम्हें ऐसे लोगों से नफ़रत है—और भी बहुत कुछ।

यह मेरे लिए बहुत बड़ा झटका था।

पहली बार मुझे एहसास हुआ कि मैं सचमुच इतने दिनों से गलत कर रहा था। सच में, मुझे समझना चाहिए था कि हर किसी की सहनशक्ति समान नहीं होती। मुझे तुम्हारे छोटे-छोटे प्रयासों की सराहना करनी चाहिए थी। बार-बार कमियाँ निकालने से व्यक्ति का आत्मविश्वास गिरता है।

“तुम यह नहीं कर सकती, तुम वह नहीं कर सकती” जैसे तानों की जगह मुझे यह कहना चाहिए था कि “चलो, इतना तो किया न, आगे यह भी कर लेना। तुमने अच्छा प्रयास किया है, मुझे भरोसा है कि तुम कर लोगी।”

मुझे तुम्हारा आत्मविश्वास बढ़ाना चाहिए था।

मुझे बहुत ग्लानि हो रही है। भीतर से हार्दिक दुःख हो रहा है। मुझसे बहुत बड़ी गलती हो गई। मैं क्यों सबको अपने जैसा बनाना चाहता रहा? क्यों चाहता रहा कि सब परिपूर्ण हों? सराहना सबको अच्छी लगती है। प्रेम में इतना भी अधिकार नहीं होना चाहिए कि हम किसी के व्यक्तित्व में वे सारे गुण भर देना चाहें जो हम स्वयं देखना चाहते हैं।

यह किसी की आत्मा पर अधिकार करने जैसा है।

मैं दिल से क्षमा चाहता हूँ। मुझे माफ़ कर दो। मुझसे गलती हो गई। मुझे आत्मग्लानि हो रही है। मुझे ऐसा नहीं करना चाहिए था। यदि समय-यात्रा संभव होती तो मैं पीछे जाकर यह सब ठीक कर देता। पर अफ़सोस, ऐसा संभव नहीं है।

तुम ही बताओ कि मैं क्या प्रायश्चित करूँ? क्रोध में तुमने कहा भी था कि “गिल्ट ही इसका प्रायश्चित है”, और वह मैं कर ही रहा हूँ। लेकिन मुझे एक अवसर तो दे दो। आइंदा ऐसी गलती नहीं होगी। मैं कान पकड़कर माफ़ी माँगता हूँ।

मैं यह सब तुम्हें खुश करने के लिए नहीं कह रहा, बल्कि इसलिए कह रहा हूँ क्योंकि मेरे हृदय में सचमुच यही भाव उठ रहे हैं। आँखें भी भरी हुई हैं।

अब तुम्हें मैं नहीं समझूँगा तो कौन समझेगा? मुझे यह भी पता है कि तुमने जो कटु वचन कहे, वे वस्तुतः तुम्हारे मन की सच्चाई थे; फिर भी उन्हें कहकर तुम स्वयं भी दुःखी हुई होगी। क्योंकि तुम मुझे जितना मानती हो और जिस रूप में मानती हो, वह मेरे लिए अप्रतिम है।

तुम किसी का भी काम कर सकती हो, चाहे वह अपरिचित व्यक्ति ही क्यों न हो। तुम्हें किसी को “ना” कहना नहीं आता। तुम पूरे घर की चहेती और दुलारी हो। सबकी सेवा-टहल करती हो, सबका ध्यान रखती हो। लेकिन अपने लिए किसी से कोई सहायता नहीं माँग पाती।

मैंने कहीं पढ़ा था कि हम अपनी विरासत से भाग नहीं सकते—वह अच्छी हो या बुरी, यह हम नहीं चुनते। राहुल गांधी का इसमें कोई योगदान नहीं था कि वे तीन-तीन प्रधानमंत्रियों वाले परिवार में पैदा हुए।

उसी प्रकार तुम्हें भी कुछ विशेष सुविधाएँ मिलीं, तो उसमें तुम्हारा कोई दोष नहीं है। यदि तुम आज तक ट्रेन में नहीं बैठीं या कभी अकेले सौ किलोमीटर की यात्रा नहीं की, तो इसका अर्थ यह बिल्कुल नहीं कि यह तुम्हारी अपनी इच्छा से हुआ। वे सुविधाएँ न तुमने अर्जित कीं, न किसी से माँगीं; वे बस तुम्हें मिल गईं।

फिर भी, तुमने इन सब सीमाओं से बाहर निकलने की बहुत कोशिश की है।

मुझे हमेशा से यह डर रहा है कि तुम्हारे इस गुण का कोई अनुचित लाभ न उठा ले। सच कहूँ तो समाज तुम्हारे जैसे लोगों के योग्य नहीं लगता। तुम किसी और को खुश देखकर स्वयं खुश हो सकती हो। मुझे अच्छी तरह पता है कि तुम्हें अपने दुःख या असुविधा की कीमत पर भी दूसरों को खुश करना अच्छा लगता है। तुम किसी के दुःख के साथ गहरी सहानुभूति रखती हो।

सच तो यह है कि मुझे कभी-कभी लगता है कि तुम्हारे इसी भोलापन और सरल स्वभाव के कारण तुम्हें बहकाना, तुम्हारा फ़ायदा उठाना या तुम्हें भावनात्मक रूप से ब्लैकमेल करना आसान हो सकता है।

शायद इसी डर में, तुम्हें मज़बूत बनाने की कोशिश करते-करते, मैं यह भूल गया कि मज़बूत बनाने और कठोर बना देने में बहुत अंतर होता है।

उस भूल के लिए मैं एक बार फिर तुमसे क्षमा माँगता हूँ।

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