the wait

मैंने कभी एक फिल्म देखी थी,उसकी कहानी अच्छे से याद नहीं आ रही थी, उसमें एक प्रेग्नेंट लड़की और एक बूढ़ा आदमी थे। शायद वे एक बस स्टॉप पर मिले थे, बुजुर्ग व्यक्ति को लास्ट में लड़की लेकर बस से चली जाती है। बड़ा भावुक सा दृश्य था।बस  कहां ले गई उनको?
आज मुझे याद आया कि कौन सी फिल्म थी,कब देखा था... उस लड़की की क्या कहानी थी ? क्यों दुखी थी। मन बेचैन हो गया। बहुत सोचा पर याद नहीं आया
फिर मैने दिमाग पर जोर डाला कि उसका नाम याद आए तो उसे फिर देखूं फिर अंततः चैटजीपीटी की शरण में गया ... वहां भी बहुत देर यही प्लॉट डाल कर खोजा पर नहीं मिला... मुझे पता नहीं क्यों लग रहा था कि या तो ये काफ्का की कहानी है या कोई रशियन कहानी या फिल्म है। अलग अलग prompt देकर खोजा, इसी चक्कर में मेटामोर्फोसिस जैसी कालजयी कहानी फिर से पढ़ गया ,बहुत मुश्किल से इसने खोजा कि यह एक शॉर्ट फिल्म सह मानसिक रोग जैसे आटिज्म, डिमेंशिया जागरूकता अभियान से संबंधित थी। और नाम था The wait... फिर देखा इसे तल्लीनता से।

पूरी कहानी कुछ इस प्रकार है कि एक गर्भवती महिला बस स्टॉप पर बैठी है। चेहरे पर चिंता साफ़ दिख रही है। वह फोन पर किसी डॉक्टर से बात कर रही है। बातचीत से पता चलता है कि वह अपने बीमार पिता को लेकर परेशान है। साथ ही माँ बनने की जिम्मेदारी और भविष्य का डर भी उसे अंदर ही अंदर खाए जा रहा है।
उसी बस स्टॉप पर एक बुज़ुर्ग व्यक्ति भी बैठा है।
दोनों के बीच बातचीत शुरू होती है। बुज़ुर्ग उससे उसके बच्चे के बारे में पूछते हैं, उसके डर सुनते हैं और बड़े स्नेह से समझाते हैं कि सब ठीक हो जाएगा। महिला धीरे-धीरे खुलती जाती है। वह अपने मन की सारी चिंताएँ उस अजनबी के सामने रख देती है।
बुज़ुर्ग बड़ी आत्मीयता से उसे हिम्मत देते हैं। ऐसा लगता है मानो कोई पिता अपनी बेटी को समझा रहा हो।
फिल्म आगे बढ़ती है और हम भी यही मानकर देखते रहते हैं कि यह दो अजनबियों की एक संयोगवश हुई मुलाक़ात है—एक परेशान होने वाली माँ और एक अनुभवी बुज़ुर्ग।
फिर बस आती है।
महिला खड़ी होती है, उस बुज़ुर्ग का हाथ पकड़ती है और कहती है
"Come on Dad, our bus is here."
बस यहीं से पूरी कहानी बदल जाती है।
जिस आदमी को हम पूरी फिल्म में एक अजनबी समझते रहे, वह उसका अपना पिता था।
पिता, जो डिमेंशिया से पीड़ित हैं।
उन्हें याद नहीं कि सामने बैठी महिला उनकी बेटी है। उन्हें उसका नाम याद नहीं, उसका बचपन याद नहीं, उससे अपना रिश्ता भी याद नहीं।
लेकिन अजीब बात देखिए...
उन्हें यह याद न रहा कि वह उनकी बेटी है, फिर भी उन्हें यह याद रहा कि एक डरी हुई लड़की को कैसे हौसला दिया जाता है।
डिमेंशिया उनकी स्मृतियाँ ले गया, लेकिन उनके भीतर का पिता नहीं ले जा सका।
फिल्म खत्म हो गई,
कभी-कभी इंसान आपको पहचानना भूल जाता है, मगर आपसे किया हुआ प्रेम नहीं।
और शायद यही प्रेम की सबसे सुंदर परिभाषा है। ❤️

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