रेप
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आज पूरा देश स्तब्ध है, सबके होठों पर अनगिनत सवाल हैं आंखें पथरा चुकी हैं, हृदय में शोले उमड रहे हैं। ऐसा कोई दिन नहीं होता जिस दिन अखबार मैं खून से रंगी खबरें ना होती हो ।ये कैसा देश बन चुका है ?चारों तरफ जोंबी घूम रहे हैं ।देश को फिर एक सनसनीखेज मिल गई है।चैनलों की टी आर पी भी बढ़ रही है। कैंडल मार्च निकल रहे हैं, हाथों में तख्तियां लिए हुए विरोध प्रदर्शन हो रहे हैं ,लंबे लंबे लेख लिखे जा रहे हैं, कविताएं लिखी जा रही हैं।परन्तु हर बार की तरह हम फिर भूल जाएंगे।हम कभी निर्भया ,कभी दामिनी ,कभी आशिफा ,कभी नैंसी, कभी संजली इत्यादि ऐसे अनगिनत नाम है, किन-किन का नाम लूँ। भारत में हर 6 मिनट पर एक बलात्कार होता है। इतना इतना असुरक्षित माहौल शायद पहले कभी नहीं था स्त्रियां कहीं सुरक्षित नहीं है ना घर में ना पड़ोस में ना स्कूल में नसरत पर ना सड़क पर ना स्टेशन पर ना बाजार में कहीं नहीं।
पूरा देश शोक संतप्त है,अभिशप्त है ऐसे समाज में जीने को। मुझे तो पुरूष होने पर ग्लानि हो रही ,शर्म आ रही है National crime bureau के अनुसार बलात्कार के 90% आरोपी पीड़िता की रक्त संबंधी है। हमें क्या डूब मरना नहीं चाहिए? पूरी की पूरी एक पीढ़ी बर्बाद हो चुकी है इसको फर्क नहीं पड़ता बहुत व्यापक प्रबंध की आवश्यकता है चारों ओर इन अपराधियों को मृत्युदंड देने की मांग की जा रही है मैं भी कर रहा हूं परंतु क्या मृत्युदंड मात्र देने से ही इस समस्या का समाधान हो जाएगा? क्या चौराहे पर फांसी पर लटका देने मात्र से ही बलात्कार रुक जाएंगे ?क्या नपुंसक बना देने मात्र से बलात्कार होने बंद हो जाएंगे ?कुछ लोग कपड़ों तक को दोष दे रहे परंतु आंकड़े ऐसा नहीं कहते। जब से मृत्युदंड देने की बात चली है और कानूनी प्रावधान किए गए हैं तब से बलात्कार के बाद पीड़िता की हत्या की संख्या में बेतहाशा वृद्धि की गई है ना जीवित रहेगी ना वो बता पाएगी कि उसके साथ क्या हुआ? किसने किया? कैसे किया?
यह समस्या बहुत पुरानी है इसकी जड़ें बहुत गहरी हैं किरण मृत्युदंड केवल मृत्युदंड फांसी की सजा जिंदा जला देने की सजा नपुंसक बना देने की सजा उम्र कैद देने की सजा काफी नहीं है इसलिए हमें व्यापक प्रबंध करने होंगे प्राथमिक स्तर से ही योग शिक्षा लागू करनी होगी बच्चियों को मार्शल आर्ट की ट्रेनिंग देनी होगी गुड टच बैड टच बताना होगा फास्ट ट्रैक अदालतें गठित करनी होंगी ।प्राथमिक विद्यालय ,महाविद्यालय ,शिक्षण संस्थान में मनोचिकित्सक काउंसलर की नियुक्ति की जानी होगी जो इन मनसिक रूप से बीमार हो चुके पुरूषो की पहचान कर उनकी समय रहते काउसिग कर सके। जागरूकता अभियान चलाए जाने होंगे। अन्य बहुत हमारे देश का कानून लचर है, ये सब मानते हैं । अगर कानून सख्त हो तो शायद अपराधिक मामलों की संख्या बहुत कम हो जाती।कमजोर कानून और इंसाफ मिलने में देर भी बलात्कार की घटनाओं के लिए जिम्मेदार है। देखा जाए तो प्रशासन और पुलिस कमजोर नही हैं, कमजोर है उनकी सोच और समस्या से लड़ने की उनकी इच्छा शक्ति। पैसे वाले जब आरोपों के घेरे में आते हैं तो प्रशासनिक शिथिलताएं उन्हें कटघरे के बजाय बचाव में आ जाते हैं। अब तक कई मामलों में कमजोर कानून से गलियां ढूंढ़कर अपराधी के बच निकलने के कई किस्से सामने आ चुके हैं।कई बार सबूत के आभाव में न्याय नहीं मिलता और अपराधी छूट जाता है।
पूरा देश शोक संतप्त है,अभिशप्त है ऐसे समाज में जीने को। मुझे तो पुरूष होने पर ग्लानि हो रही ,शर्म आ रही है National crime bureau के अनुसार बलात्कार के 90% आरोपी पीड़िता की रक्त संबंधी है। हमें क्या डूब मरना नहीं चाहिए? पूरी की पूरी एक पीढ़ी बर्बाद हो चुकी है इसको फर्क नहीं पड़ता बहुत व्यापक प्रबंध की आवश्यकता है चारों ओर इन अपराधियों को मृत्युदंड देने की मांग की जा रही है मैं भी कर रहा हूं परंतु क्या मृत्युदंड मात्र देने से ही इस समस्या का समाधान हो जाएगा? क्या चौराहे पर फांसी पर लटका देने मात्र से ही बलात्कार रुक जाएंगे ?क्या नपुंसक बना देने मात्र से बलात्कार होने बंद हो जाएंगे ?कुछ लोग कपड़ों तक को दोष दे रहे परंतु आंकड़े ऐसा नहीं कहते। जब से मृत्युदंड देने की बात चली है और कानूनी प्रावधान किए गए हैं तब से बलात्कार के बाद पीड़िता की हत्या की संख्या में बेतहाशा वृद्धि की गई है ना जीवित रहेगी ना वो बता पाएगी कि उसके साथ क्या हुआ? किसने किया? कैसे किया?
यह समस्या बहुत पुरानी है इसकी जड़ें बहुत गहरी हैं किरण मृत्युदंड केवल मृत्युदंड फांसी की सजा जिंदा जला देने की सजा नपुंसक बना देने की सजा उम्र कैद देने की सजा काफी नहीं है इसलिए हमें व्यापक प्रबंध करने होंगे प्राथमिक स्तर से ही योग शिक्षा लागू करनी होगी बच्चियों को मार्शल आर्ट की ट्रेनिंग देनी होगी गुड टच बैड टच बताना होगा फास्ट ट्रैक अदालतें गठित करनी होंगी ।प्राथमिक विद्यालय ,महाविद्यालय ,शिक्षण संस्थान में मनोचिकित्सक काउंसलर की नियुक्ति की जानी होगी जो इन मनसिक रूप से बीमार हो चुके पुरूषो की पहचान कर उनकी समय रहते काउसिग कर सके। जागरूकता अभियान चलाए जाने होंगे। अन्य बहुत हमारे देश का कानून लचर है, ये सब मानते हैं । अगर कानून सख्त हो तो शायद अपराधिक मामलों की संख्या बहुत कम हो जाती।कमजोर कानून और इंसाफ मिलने में देर भी बलात्कार की घटनाओं के लिए जिम्मेदार है। देखा जाए तो प्रशासन और पुलिस कमजोर नही हैं, कमजोर है उनकी सोच और समस्या से लड़ने की उनकी इच्छा शक्ति। पैसे वाले जब आरोपों के घेरे में आते हैं तो प्रशासनिक शिथिलताएं उन्हें कटघरे के बजाय बचाव में आ जाते हैं। अब तक कई मामलों में कमजोर कानून से गलियां ढूंढ़कर अपराधी के बच निकलने के कई किस्से सामने आ चुके हैं।कई बार सबूत के आभाव में न्याय नहीं मिलता और अपराधी छूट जाता है।
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