कितनी बार सोचा है कि मां पर कुछ लिखूं, बारहा सोचा है,पर मां पर लिखना इतना आसान कहां है।अनेक बार कलम उठाई है, रख दी है। अनेक बार कीपैड खोला है बंद कर दिया है, कोई सिरा नहीं मिलता कि कहां से शुरू करूं, संघर्ष की गाथा का पहला शब्द ही मां है। टन टन की आवाज से नींद खुल गई है... अदरक कूटने की ध्वनि है। कूटते आवाज़ भी दे रही मुझे। अंगड़ाई ले कर उठ रहा हूँ, नेपथ्य से महामहिम पिताश्री के झाड़ू लगाने की खर खर के बैकग्राउंड म्यूजिक में की ध्वनि है कि “सुतले रह लो 12 बजे ले..“ । मैं समझ गया कि सात बज गया है। मजदूर भाई लोग आ गए हैं, निर्माण कार्य चल रहा है, इसलिए सबको और पहले उठना पड़ता है, क्योंकि नल पर वे भी बार बार आते हैं। पापा के लिए तुलसी अदरक मिर्च का काढ़ा तैयार हो गया है, समझ गया हूँ कि हलाहल का घूंट मुझे भी पीना पड़ेगा ही क्योंकि ज़ुकाम में पापा का खौफ है।मैं उठ के बाथरूम की ओर चल दिया हूँ।क्योंकि इसके बाद मम्मी अपने और मेरे लिए चाय बनाएगी। मम्मी की सत्तर की अवस्था में मैं इसे डिसाइड नहीं कर पाया कि मम्मी भोर में उठती है या मम्मी के उठने से भोर होती है।क्योंकि मम्मी ने बर्तन भी धुल लिए है...
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