मजदूर


$$$मजदूर  $$$   १  मई  2015
मै मजदूर हूँ 
मै जन्म से मजदूर हूँ 
शायद उससे भी पहले से
मै पैदा होने से पहले से ही 
चिर मजदूर हूँ 
आदिम पसीने से लथपथ देह
हाथो पर पड़े अकाल की रेखाओं में 
अंकुरित प्रेम का हस्र हूँ ।

कितना कुछ भरा है मैंने इन हाथों से
कभी अपना पेट,
 कभी उनका खलिहान,
कभी जुबान बंधक, 
कभी गिरवी मकान
अमीरों ,महाजनों के वैभव और ठाट का
औचित्यहीन नित्य चिंतन-विमर्श हूँ ...
मैं मजदूर हूँ आदिम मजदूर हूँ ।

मैं मजदूर हूँ 
धरा का अन्तिम व्यक्ति 
क्षुधा की आग में सेकी है रोटियां 
खेला हूँ मजबूर होकर रोटी कि गोटियाँ 
चिर काल से मैं मजबूर हूँ 
मैं एक मजदूर हूँ ।

आसमान के नीचे मेरा आशियां
चीर धरती का वज्र कवच सोना उपजाया
कर समर्पित जीवन असहाय निराश्रित खुद को पाया
तुम्हारी सभ्य दुनिया से सदियों दूर हूँ 
मैं एक मजदूर हूँ ।

लगी बोलियाँ बिका बार बार
 धर्म मोक्ष समाज से मुझे क्या 
बना रहा समाज का हाशिया
रक्त स्वेद अश्रु से सिंचित धरा
आयी अन्न की बाढ़ पेट कभी न भरा
अपने अस्तित्व से कोसो दूर हूँ 
हाँ मैं मजदूर हूँ ।

लिए बुभुक्षित मन व्यथित तन
बना रहा सत्ता के नींव की ईट
आये तुफान दरके सिघासन गिरे 
फिर भी अक्षुण्ण रही नींव की ईट
फिर भी मैं मजबूर हूँ ।
हाँ मैं एक मजदूर हूँ ।

मिलकर ज्योति जलाना होगा सोते दिये जगाना होगा..
अगणित दीप बुझे हैं रण में
अश्रु जले संध्या के लय में
कुचले हुए शत्रु अंतर में
 स्वेद रक्त पर स्वप्न चढ़ा कर जीवन दीप बनाना होगा
मिल कर ज्योति जलाना होगा...

बुझते हुए धर्म के दीपक
लुटी हुई सभ्यता के दीपक
शोषित वसुन्धरा के दीपक
नयी शृष्टि के उद्गम पथ पर फिर नवदीप जलाना होगा
मिलकर ज्योति जलाना होगा..

व्यष्टि के लघु आवर्तों से
सृष्टि के चिर आयामों में
विद्रुप हृदय के कोशो से
श्याम विवर दिक् कालों में
दुःख की काली अमावस में शशि को पुनः बुलाना होगा
मिल कर ज्योति जलाना होगा।



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