मूंछें

मेरे पिता की ऊँची नाक थी
इतनी ऊँची कि चाय के गिलास में डूब जाया करती थी
जिन पर हँस पड़ती थी 
घर की बच्चियाँ, 

उनके पिता की भी नाक भी ऊँची थी
ऐसा दादी बताती हैं,

जिनके रौबदार मूंछो से बिना डरे
घर की बच्चियाँ खेलती थी बचपन में

बच्चियाँ बड़ी होती गईं 
उनके साथ साथ बढ़ती गई उनकी मूंछे भी

मूंछें बढ़ती गई जैसे बढ़ती है अमरबेल 
बच्चियां बढ़ कर लड़कियां हो गईं 
और मूंछें बढ़ कर इज्ज़त
 
मूंछें बरगद बनी
जिसके नीचे पली
किसी पीले पौधे के जैसे बच्चियाँ 
अपने हिस्से का आकाश ढूंढ रहीं आज भी

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