शेखर एक जीवनी
किशोरवय का मन यदि अबोध और अभिमानी हो तो किसी तरुणी की मूर्ति बनाकर उसकी उपासना करने लगता है फिर वह बहिन हो या सखी (किन्तु यह तो अब विगत सदी की बात हो गई क्योंकि इस सदी ने अबोध-तत्व की जैसे हत्या की है उसने तो आत्मा का मानचित्र ही बदल दिया है!)
परन्तु वैसा क्यों होता था? क्योंकि देह में दुर्निवार चाहना की गूंज चली आई है, उसके वलय जगने लगे हैं, किन्तु बुद्धि अभी उसकी व्याख्या नहीं कर सकती है। अभी वह इतनी वयस्क नहीं हुई। वयस्क शब्द में ही वय है!
हृदय में एक हाहाकार उठता है जो उसको मथ डालता है। किशोरवय का मन यदि अबोध होने के साथ ही अभिमानी भी हो तो उस ज्वार की व्याख्या एक ऐसी आसक्ति की तरह करता है जो सांसारिक नहीं अपार्थिव है। किसी तरुणी को वह अपने हृदय की सम्राज्ञी बनाकर पूजने लगता है और अगर उसको भनक भी लग जाए कि उसका वो व्यक्ति-विग्रह निरा नश्वर है, तो आत्महंता अवसाद से वह घिर जायेगा।
अपनी उपास्य को वह कभी शशि कहेगा, कभी शारदा, कभी सरस्वती, किन्तु वह उसकी प्रतीक्षा करेगा, उसकी प्रतिमा को परिष्कृत करेगा, कभी पुष्पों से उसको सजाने का उद्यम, किन्तु अपनी उस प्राणमूर्ति के बिना जी नहीं सकेगा। इस कल्पना से ही वो सिहर उठेगा कि कभी वो उसकी अवमानना कर बैठेगी या उससे दूर चली जायेगी! ("रमा विवाह करके पति के घर चली गई, रमा नहीं सरस्वती!")
छोटी से छोटी बात पर आहत होकर वह रो बैठेगा, अभिमान को ठोस लगा लेगा, रूठेगा, स्वयं को कष्ट देगा... फिर जैसे इस ईशद्रोह की ग्लानि से भरकर, तड़प के साथ अपनी आराध्या की ओर लौटेगा, उसके चरणों में सिर रखकर रोते हुए अपना कलुष गला देने की त्वरा से भर उठेगा... यह सब इसलिए कि वह अभिमानी है, अबोध है, और उसकी देह, आत्मा, हृदय एक अव्याख्येय तूफ़ान के किनारे हतप्रभ खड़े हैं।
"निकट अपनों के
निकटतर भवितव्य की अपनी प्रतिज्ञा के
निकटतम इस वि-बुध सपनों की सखी के
आ गया था
आ गया था
रात होते!"
कालान्तर में वो सम्यक पुरुष बनेगा, स्त्री को स्त्री की तरह चीन्ह लेगा, उसको वरेगा, उससे संयुक्त होगा, किन्तु आजीवन वो अपनी उस रूढ़ि से मुक्त नहीं हो सकेगा जो उसने किशोरवय में किसी तरुणी के लिए जानी थी। उसकी निद्रा विगत के दुःस्वप्नों से भरी होगी। वह स्वयं को देशच्युत जानेगा, अपने केन्द्र से ही विस्थापित समझेगा, उसका निष्कवच मन फिर से वैसा अबोध हो जाने को विकल होगा।
"इस सूखी दुनिया में प्रियतम मुझ को और कहाँ रस होगा?
शुभे! तुम्हारी स्मृति के सुख से प्लावित मेरा मानस होगा!"
किन्तु अब यह सम्भव नहीं, उसकी देह अब प्रौढ़ हो गई, कामना के सत्य को उसने जान लिया, वह कुंवारी प्रेरणा अब मर गई। अब वह केवल आखेटक है या सहचर है, उपासक नहीं। चेतना के उस आत्मीय प्रसंग की क्षति हो चुकी।
अज्ञेय हिन्दी के इकलौते लेखक हैं, जो किशोरवय की इस गति को ठीक तरह से गल्प में लिख सके। शेखर एक जीवनी में उन्होंने यह सम्भव कर दिखाया। वो इस आदिम प्रेरणा के लोक में, इतनी दूर, इतनी त्वरा से चले गए थे कि अब वो अद्वितीय हो गए हैं।
हिन्दी का संसार एक सदी पहले इस कृति के लिए हरगिज़ तैयार नहीं था। और आज जब अबोध हृदयों की हत्या कर दी गई है तब तो यह कृति और दुर्बोध हो चली है।
किन्तु जिस पुरुष ने उस वय को जीया है, उस गति को जाना है, वो इस पुस्तक पर हाथ रखकर शपथ लेगा, और अपने हृदय के सबसे पवित्र, सबसे सघन, सबसे संतप्त रहस्य को यों लिख डालने वाले वात्स्यायन के प्रति अगाध आस्था से भर उठेगा।
आज भी हिन्दी में शेखर के समकक्ष कोई नहीं है!
-सुशोभित
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