दृष्टि दोष1
जेम्स वेब अंतरिक्ष दूरबीन किस तरह से ब्रह्मांड के इतिहास को देखने में सक्षम है ?
इस विषय पर विज्ञान विश्व पर पोस्ट की एक शृंखला आएगी, आरंभिक अनुमान से इस विषय पर 10-12 पोस्ट होंगी। अंत से सारी पोस्ट को https://vigyanvishwa.in/ पर एक लेख के रूप मे संकलित किया जाएगा।
प्रस्तुत है इस शृंखला की पहली कड़ी:
भाग 1 : मानव आंखें कैसे देखती है ?
किसी भी वस्तु को देखने के लिए सबसे महत्वपूर्ण है, प्रकाश! बिना प्रकाश के दृष्टि संभव नहीं है। मानव तथा अन्य प्राणियों की देखने की क्षमता प्रकाश , आँखों और मस्तिष्क के पारस्परिक क्रिया से बनती है। हमारी दृष्टि किसी वस्तु को उससे निकलने वाले प्रकाश से देखती है जो अंतरिक्ष या अवकाश को पार कर हमारी आँखों तक पहुंचता है, हमारी आंखें उस प्रकाश को ग्रहण कर मस्तिष्क तक संकेत भेजती है और हमारा मस्तिष्क उन संकेतों को समझ कर उस वस्तु के आकार , प्रकार, स्थान और गति संबंधित सूचनाओं का निर्माण करता है।
किसी वस्तु से निकलने वाला प्रकाश उसका स्वयं का हो सकता है जैसे सूर्य, तारे, चंद्रमा, जलती मोमबत्ती या बल्ब! लेकिन अधिकतर मामलों में यह प्रकाश किसी प्रकाश स्रोत द्वारा निर्मित प्रकाश को उस वस्तु द्वारा परिवर्तित होता है।
जब कोई वस्तु किसी विशिष्ट रंग का परावर्तन करती है तब वह वस्तु हमें उस विशिष्ट रंग की दिखाई देती है। जैसे लाल टमाटर सभी रंगों को सोख लेता है और लाल रंग का परावर्तन करता है। यदि कोई वस्तु सारे रंगों को सोख ले तो वह वस्तु हमें काली दिखेगी जबकि कोई भी रंग ना सोखे तो वह वस्तु हमें सफेद दिखेगी।
हमारी हमारा मस्तिष्क बहुत विशिष्ट है, वह दो आँखों के सहयोग से किसी भी वस्तु की गहराई की गणना कर लेता है, क्योंकि दोनों आँखों में पहुँचने वाले प्रकाश द्वारा तय की गई दूरी में सूक्ष्म लेकिन अंतर होता है, इस अंतर को समझ कर हमारा मस्तिष्क गहराई जान लेता है। केवल एक आँख से देखते हुए सीढ़ियाँ उतरने का प्रयास कीजिए।
मानव आँखें , कैमरे या दूरबीन की कार्यप्रणाली एक जैसी है। इन तीनों में लेंस होते है जो प्रकाश को एक जगह पर केंद्रित करते है, छवि बनाने के लिए आंखों में दृष्टि पटल होता है, कैमरे में फिल्म/सेंसर होते है, दूरबीन में दर्पण होते है। आधुनिक दूरबीन, कैमरे में लगे कंप्यूटर की जगह हमारे पास मस्तिष्क है ही।
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