डायरी

कल एक परीक्षा देने गया था। इन दिनों पूर्वांचल में भीषण गर्मी पड़ रही है,गर्मी से हालत पस्त थी।परीक्षा कक्ष एकदम कोने में था।एक तो छोटे से हाल में पचास कैंडिडेट्स ऊपर से बहुत गंदी वाली उमस।बिजली की कोई व्यवथा नहीं थी,पंखा तो खैर नहीं ही चल रहा था और साथ साथ रौशनी की भी कोई व्यवस्था नहीं।परीक्षा सूचिता के नाम पर खिड़कियों तक को स्थायी रूप से बंद कर दिए थे।दस मिनट में ही सब पसीने से तर बतर हो गए।
हमने कक्ष निरीक्षक से बिजली की व्यवस्था करने को कहा पर उन्होंने ने अनसुना कर दिया।हमारे दो बेंच आगे एक प्रेगनेंट महिला बैठी थीं।एक तो उनसे बैठा नहीं जा रहा था और दूजे उनको लिखना भी था। भीषण गर्मी थी,पसीना इतना हो रहा था कि उनसे क्या पूरे क्लास से लिखा नहीं जा रहा था। कापी भीग जा रही थी।
मैं स्वयं विजुअली इंपायर्ड हूं,काम रौशनी में देखने में दिक्कत होती है,मुझे देखने और लिखने में समस्या हो रही थी। मैं कई बार कक्ष निरीक्षक महोदय से कहा कि कम से कम प्रकाश का तो प्रबंध कर दें।बाद में चीखा और उलझ भी गया।लेकिन गार्ड साहब टस से मस न हुए।
आश्चर्य जनक बात ये थी कि 35 के करीब महिलाएं या लड़कियां थी कक्षा में,वो प्रेगनेंट महिला भी।किसी ने मेरा साथ नहीं दिया,कुछ लड़कों ने जरूर दिया।यह देखकर यह समझ आ गया कि महिलाएं कितना समयोजनशील होती हैं।यह बचपन से हुई कंडीशनिंग का नतीजा है। उफ़ आह तक नहीं कीं और उसी तरह परीक्षा समाप्त हुई...

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