डायरी

(१)
स्मृतियां प्रायः सुखद होती हैं लेकिन कभी कभी उनकी पुनः घटित न होने की कसक हमें क्षोभ और दुःख से भर देती हैं।हमें पता है कि स्मृतियां मात्र किसी रिकॉर्डेड विडियोज या चित्र की मानिंद हैं जिसका वर्तमान में कोई अस्तित्व नहीं परंतु वे बार बार अपनेवको दुहराने का विनय करती हैं।
हर बीता हुआ पल किसी तस्वीर की भांति अतीत है।उसका न होना ही उसके अस्तित्व का प्रमाण है।

(२)
  कैलेंडर में कितने दिन गुजरते गए परंतु हमारी शाम तक नहीं होती। तुम्हारी गुड मॉर्निंग नए दिन का आहट दे जाती है और अगली गुड मॉर्निंग इसके खत्म होने की सूचना भी । व्हाट्सप्प पर तुम्हारा online रहना ऐसे लगता है जैसे तुम्हारी बड़ी बड़ी आंखें निहार रहीं हों मुझे , सांसे तेज हो जाती हैं और मैं आँखें इधर उधर कर लेता हूं कि नजरें मिल न जाएं कहीं।ऑफ लाइन होना लगता है तुम कहीं दूर चले गए। ये ऑनलाइन दिखना मेरे लिए खिड़की की तरह है,जिसमे से घंटों तुम्हारी बाट देखता रहता हूं। पुनः एक बार कभी दिखने पर उलाहना भरी दृष्टि फेंकता हूं, लगता है कि प्रतीक्षा अपूर्ण रह गई,क्योंकि दिखते ही हृदय में कंपन होता कि तुम्हारा अभी ऑफलाइन होना एक नई प्रतीक्षा को जन्म देगा।आने का सुख और जाने की चिंता दोनो एक साथ चलते हैं, तब दुःख और सन्तोष के मिश्रित भाव आते हैं।विदा लेने की कल्पना ही मूल है,बाकी कहे गए शब्द तो झूठे हैं।

(३)
कैसे हो एक अनुत्तरित प्रश्न है और बढ़िया हूं एक अनुत्तरित जवाब। काश कोई यंत्र होता जो मनोभावों को शब्द de पाता 

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