विद्यालय में एक दिन

सुबह की हल्की ठंड के बीच जब मैं स्कूल पहुँचता हूँ, तो बच्चों की चहल-पहल शुरू हो चुकी होती है। कुछ बच्चे स्कूल के गेट के पास खड़े गप्पें मार रहे होते हैं, तो कुछ बिना जूते-चप्पल के मैदान में दौड़ लगा रहे होते हैं। उनके कपड़े धूल से सने होते हैं, यूनिफॉर्म के बटन टूटे हुए या गायब होते हैं—या तो खेल-खेल में या किसी झगड़े में।

मैं कक्षा में पहुँचता हूँ और उपस्थिति रजिस्टर खोलता हूँ। नाम पुकारता हूँ, लेकिन कई बच्चे गायब हैं। यह कोई नई बात नहीं है। बहुत से बच्चे सिर्फ नाम लिखवाकर गायब हो जाते हैं—कुछ दिन आते हैं, फिर महीनों तक नहीं दिखते। परीक्षा के समय भी कुछ बच्चों को कोई दिलचस्पी नहीं होती, जैसे यह उनके लिए कोई मायने ही नहीं रखती।

रोज होमवर्क के लिए चिल्लाता हूँ।चार पांच लड़कियां और एक या दो लड़कों को छोड़ कर पूरी कक्षा नील बट्टे सन्नाटा में रहती है।कुल इकहत्तर बच्चों में से तीस ये चालीस उपस्थिति रहती है।जब भी होम वर्क के लिए कहो सब चुप,

"क्यों, होमवर्क क्यों नहीं किया?"

"सर, समय नहीं मिला,"
"घर में काम था,"
"किताब नहीं है,"

कोई यह नहीं कहता कि "सर, पढ़ाई से क्या होगा?" लेकिन उनकी आँखों में वही सवाल छिपा होता है। उनके घरों में शिक्षा प्राथमिकता नहीं है। कोई खेत संभालने में लगा है, तो कोई अपनी माँ के साथ छोटे भाई-बहनों की देखभाल में। ज़्यादातर मामलों में, होमवर्क सिर्फ एक बोझ बन जाता है—एक ऐसा काम जिसे वे पूरा करना भी चाहें, तो कर नहीं सकते।हालांकि, हर कक्षा में कुछ छात्र-छात्राएँ ऐसे भी होते हैं जो बहुत तेज़ होते हैं। वे सीमित संसाधनों में भी मेहनत करते हैं, जिज्ञासु रहते हैं और पढ़ाई को गंभीरता से लेते हैं। जब वे सवालों का जवाब तेजी से देते हैं, नई चीज़ें सीखने की ललक दिखाते हैं, तो लगता है कि मेहनत रंग ला सकती है। यही वे बच्चे हैं, जिन्हें देखकर पढ़ाने का हौसला मिलता है।

लेकिन यही संसाधनों की कमी सबसे बड़ी चुनौती है। कई बार किताबें नहीं होतीं, ब्लैकबोर्ड पुराने और टूटे होते हैं, प्रयोगशाला है हीनहीं ।कमरे पर्याप्त नहीं हैं। बच्चों के पास कॉपियां कम होती हैं, पेन तक उधार मांगकर लिखना पड़ता है। ऐसे हालात में शिक्षा को गंभीरता से लेना बच्चों के लिए और भी मुश्किल हो जाता है।

जैसे ही परीक्षा का समय आता है, छोटे-छोटे बच्चे नकल करने की फ़िराक़ में रहते हैं। उनके लिए परीक्षा एक चुनौती कम और एक ऐसी दीवार ज़्यादा है, जिसे छलांग लगाकर पार करना है। वे घूम घूम अध्यापकों से ही सवाल पूछ कर लिखते हैं।एक-दूसरे से जवाब पूछते हैं। उन्हें रोकना आसान नहीं होता, क्योंकि उनके लिए यह 'गलत' नहीं, बल्कि 'जरूरी' लगता है।

इसके अलावा, कुछ बच्चे हंसी-मज़ाक में या गुस्से में गाली भी देते हैं। जब मैं उन्हें रोकता हूँ और समझाता हूँ कि यह गंदी बात है, तो वे हँस देते हैं। उनके घरों में बड़े-बुजुर्गों को बिना किसी झिझक के गाली देते देखना उनके लिए सामान्य है। वे इसे भाषा का हिस्सा मानते हैं, यह नहीं समझते कि यह सही या गलत भी हो सकता है। धीरे-धीरे, मैं उन्हें समझाने की कोशिश करता हूँ कि गाली देना कोई बहादुरी नहीं, बल्कि एक बुरी आदत है। कुछ बच्चे मान जाते हैं, कुछ फिर भी आदत नहीं छोड़ते।

स्कूल के बाद जब बच्चे घर की ओर लौटते हैं, तो मेरे मन में कई सवाल उमड़ते हैं। कितने बच्चे कल आएँगे? कितनों ने आज जो सीखा, उसे याद रखा होगा? कितने परीक्षा देंगे, और कितने भूल जाएँगे?

हर दिन एक नई चुनौती होती है। लेकिन जब कभी कोई बच्चा खुद आकर पूछता है, "सर, ये सवाल फिर से समझा दीजिए," तो मुझे लगता है कि यह संघर्ष बेकार नहीं है। शायद बदलाव धीरे-धीरे ही सही, पर हो रहा है।

और शायद, इन्हीं तेज़ बच्चों की वजह से बाकी भी धीरे-धीरे प्रेरित हों।

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