डायरी
यह अक्टूबर है,नहीं यह हरसिंगार का महीना है।सुबह से झमाझम बारिश हो रही है।दशहरा भी बारिश में धुल गया है। मैं सुबह से good morning के जवाब की प्रतीक्षा में हूं। पल पल पर इनबॉक्स चेक कर रहा हूं।उसका जवाब नहीं आया अब तक,हो सकता है समय न मिला हो,हो सकता है मूड ऑफ हो या ये भी हो सकता है कि कोई आस पास हो। हर एक अनुमान दूसरे अनुमान को काट दे रहा।
एक गालिब का शेर याद आ रहा है कि "मोहब्बत में नहीं है फर्क जीने मरने में,उसी काफिर में मरते हैं कि जिस काफिर पर दम निकले"।
घायल मन सहानुभूति खोजता है।लेकिन धीरे धीरे सहानुभूति का आदि हो जाता है तो अपने को घायल करने से भी परहेज नहीं करता।
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