खुला आसमान

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उसे खुला आसमान चाहिए था
फैलाने के लिए पंख
मुझे बंद मुट्ठी का कोना
जिसमें छिप सकूं 
दुनिया के झंझवातो से
सुदूर घुप्प अंधकार में 
उसे चाहिए थी माघ की गुनगुनी धूप
जहाँ करवट ले सके अल्हड़पन 
मुझे चाहिए था
साँसो का कारोबार
ताकि भर सकूं निश्चेष्ट लोगों की साँसे
जो मसले हुए हैं खुद की लाशों तले
उसे चाहिए था
बेमौसम की बरसात 
जिसमें भींगो दे अपने
सभी अनकहे सूखे जज्बात
बिखेर दे दुख मे पगी हुई खुशियाँ 
मिट्टी की सोंधी सुगंध के वास्ते
मुझे चाहिए था 
सभी सितारों की रौशनी
जिससे भर दूं
दुनिया के पृष्ठ में छिपे अंधेरों में
जहाँ जमा की जा रही मक्कारियां
उसे चाहिए था
परिजात के फूलों की माला
जिसे पहनाती अपने प्रियवर को अनायास ही
उसके वक्षस्थल पर रखकर माथा
मुझे चाहिए था 
उन करोड़ों भूखे पेटों की आंच
जिसमें गलाता पैरों की बेड़ियां 
और ढालता अनगिनत सुनहरे सपने 
उसे पंसद था
रात्रि के तीसरे पहर में 
सप्तम सुर मे विलापता वैरागी
मुझे पसंद थी
खारे चेहरे लिए 
वियोगी के प्रेम में पगी स्त्रियां 
हम मिले अनायास व सहज ही
क्षितिज और आसमान की तरह।

_____________✍अतुल पाण्डेय ।

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