माँ के पिता
माँ के पास बहुत बाते हैं। वह बहुत कुछ कहना चाहती है,उसकी बातें गुलर के फूल जैसी हैं, उसकी हर बात में से फूटती हैं, सौ बातें.. . उसकी हर बात में नाना मुख्य किरदार होते हैं।
ऐसा लगता है कि माँ को वर्षों से सुना नहीं गया।
माँ के गुजारे बचपन से लेकर कैशोर्य तक का समय,
उसकी अमिट धरोहर है।
उसे तनिक फ़र्क नहीं पड़ता कि उसकी बातें हँसी में उड़ाई जाएंगी
तंज कसे जाएंगे
या अनसुना कर दिया जाएगा
उसे बस सुनाने में सुख है।
वह मस्तिष्क में विंबित चित्रों से शब्द झरते रहते हैं
उसे खुश देखने का मतलब है कि उसे कुछ सुनाते हुए देखना।
पिता के साथ गुजारे हुए पचास साल बहुत हल्के हैं
नाना के साथ गुजारे हुए 20 सालों के सामने।
उसकी हर कहानियों के मुख्य किरदार उसके पिता हैं,
जिनकी तुलना वह रोज़मर्रे के जीवन में रोज करती है
अपनी कट रही जिंदगी का विस्तार
अपने जिए हुए जीवन में ढूंढती है।
Comments
Post a Comment