जो शेष बच गया शून्य नहीं था ,प्यार था..
जीवन शान्त कोलाहल का एक ज्वार था
दुख की सीमा सन्तापों में
सुख के अप्रतिम प्रलापो में
शब्दो से विचलित भावो में
सकुचे सिमटे से बाहो में
सुख का झीना संसार था
जो शेष बचा गया शून्य नहीं था, प्यार था..
पनघट से पनिहारीन रूठी
पतझड़ में अमराई डूबी
मोती ढूलक चले वनपथ पर
कवि से वो कविताई छूटी
सुख की दुख का अवगुन्ठन पहने
जीवन का विस्तार था
जो शेष बच गया शून्य नहीं था,प्यार था..
भावों की जब मनका गूंथी
शब्दों के आगे बेबस था
सपनो की जब जब आहूति दी
अपनो के आगे बेबस था
तेरा रूक कर मुड़ जाना ही
कमेरा असीम विस्तार थी
जो शेष बच गया शून्य नही था, प्यार था..
वो अंधेरे की आहट थी
मैं रूकता ना तो क्या करता?
हाथों से अगुलियां फिसल गयी
ना ठिठका होता गिर पड़ता,
उन आंखो का सहज सलोनापन
मेरा किञ्जित आधार था
जो शेष बच गया शून्य नहीं वो प्यार था..
जीवन शान्त कोलाहल का एक ज्वार था..शेष बच गया
Comments
Post a Comment