आग



जब चूल्हे में नहीं है आग
जब हाथों में नहीं है काम
जब स्तनों में नही बह रहा दूध
कवि !तुम प्रेम लिखना
मैं क्रांति लिखूंगा।।

जब युवाओं का, पानी हो गया खून
जब हुक्मरान, आँखे ले रहे मूंद
जब सब हैं अँधाधुन
कवि!तुम स्तुति करना
मैं आग लिखूँगा।

जब भीड़ कर रही हो न्याय
जब सत्ता की सीढ़ी से रिस रहा हो खून
संगीन के साए में झुके देहरी
कवि!तुम प्रशस्ति-वाचन करना
मैं नारे लिखूंगा ।




Comments

Popular posts from this blog

मासिक परीक्षा

मां मने धैर्य

डायरी