शहरीकरण
शहर उतरता है
टी वी फिल्मों के रास्ते गाँव में
घुलता जाता शनैः शनैः रक्त में
किसी हार्मोन की तरह
दिखाता कंक्रीट की वादियों का सब्जबाग
जिनमें है कुछ उड़ती हुई सेल्फियाँ
कुछ एक सन्नाटे को शोर है
बहुमंजिली इमारतों में जड़े सितारों की लड़िया,
जिनके पाँव को वक़्त नहीं
कि नाप ले दहलीज अपने अस्तित्व की।
चिड़ियों की चहचहाहाट को चीरता
दैत्यनुमा गाड़ियों का कर्कश शोर
गमलों में सिमटते बरगद की छाँव
सड़कों की रफ्तार से पीछे छूटते गाँव
अब हर घरों में शहर बस रहे हैं ..
सम्बन्धों के नये आयाम
शहरी परम्पराओं की आरोपित आवृत्ति
'सब कुछ बिकता है' की निर्लज्ज प्रवृत्ति
समय की निकटता
सम्बन्धों की दूरी
हरा मुखौटा पहने शहर
खुलकर विहँस रहे हैं ..
अब शहर गाँवों में उतर रहे हैं ..
✍ अतुल पाण्डेय
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