विदा लेता हूं

मेरा प्रिय महाविद्यालय 

आज मैं ऑफिशियली आप सब से अलग हो रहा हूं,ये अचानक से हो रहा है,ये यात्रा एक मोड़ ले रही। यहां हम सब एक प्लेटफार्म पर खड़े हैं सबकी अपने अपने गंतव्य स्थल है,सब कही न कही जायेंगे,आज या कल...जाना तो सबको है ही।
हम जा रहे हैं अपने साथ तमाम कहानियां,तमाम किस्से, तमाम अधूरे किस्से जो अब कभी पूरे नहीं होंगे शायद।
जब से इस व्यवस्था के हिस्सा बने तब से आज तक का पूरा दृश्य मेरे दृष्टिपटल पर चल रहा है,वो पहला दिन जब हम अजनबी जैसी आंखो से सब कुछ देख रहे थे...सब नया नया सा था, फूल पत्ते इमारतें सब बिल्कुल अनजान से थे।सारे व्यक्तित्व जो हमारे सामने थे उनसे एक अनकहा झिझक सा था।यहां तक आंखे चार करने का भी साहस नहीं जुटाना पड़ता था, निगाहें हमको हम से ही बचाती दिखती थी। नए लोग जो दोस्त बन सकते थे, नए लोग जो आदर्श बन सकते थे शायद आजीवन।सब नया नया सा था।
एक ख्वाब जो मुकम्मल हो रहा था,एक जिम्मेदारी जो यहां लाई थी,एक जज्बा जो कुछ कर दिखाने का था, एक नियति (destiny)जो कहीं और भी ले जा सकती थी,सब मिल कर इस महाविद्यालय की चौकठ तक लाए थे।

नए रिश्ते बने, नए आदर्श बने,जीवन की नई दिशा मिली, नई सीखें मिली वो सब कुछ मिला जितना हम डिजर्व करते थे।प्रेम विश्वास और अनुशासन की तालीम हासिल हुई।तमाम पूर्वाग्रह टूटे और शायद बने भी।

समय अपनी रफ्तार से चलता रहा और हम शनै शनै इस नई व्यवस्था में घुलते गए, रैनाथ महाविद्यालय अपना महाविद्यालय हो गया... इसका जर्रा जर्रा अपना हो गया,इसके प्रवक्ता अपने प्रवक्ता यहां तक कि क्लास रूम "अपने क्लास रूम" में बदलते गए और हम इसके और यह हमारा हो गया।

एक मोड़ नया आया प्लेटफार्म पर गाड़ी आ गई है,अब हमें जाना पड़ रहा है, इस महाविद्यालय को ओढ़ कर अब रुखसत होने को हैं,सब कुछ जो अपना बना था वो अलग हो रहा है। दीवारें रोक रहीं हैं, हवाएं भारी लग रहीं, पेड़ अपनी छांव सिकोड़ रहे, फूल अपनी कलियों में दुबक रहे, सामने पड़ा ब्लैक बोर्ड हमारे लिए अपने डस्ट उतार रहा है।हमारे व्यक्तित्व के चारो ओर महाविद्यालय की एक गंध लिपटी हुई है।
सब छूटेंगे सबको छूटना ही है,नए लोग आएंगे ये कक्षाएं फिर गुलज़ार होंगी, फिर कोई आएगा जो हमारी तरह ही रोयेगा। केदार नाथ सिंह जी की मेरी प्रिय कविता है कि
 
मैं जा रहा/रही हूँ—उसने कहा 

जाओ—मैंने उत्तर दिया 

यह जानते हुए कि जाना 

हिंदी की सबसे ख़ौफ़नाक क्रिया है।

जीवन का एक बहुत बड़ा टुकड़ा इसकी छांव में गुजर गया,सात वर्ष यहां रहा।मेरे व्यक्तित्व पर अमिट छाप है यूं कहिए की गढ़ा ही हुआ है।कितने बैच आए फिर गए,रजिस्टर में जो बैच वाइज दर्ज हुए वो हमारे स्मृति पटल पर रेहान, बीना ,सीमा कुशवाहा व अन्य बैच, प्रशांत रणविजय कंचन यादव वंदना कुशवाहा बैच, तृप्ति तिवारी पवन कुशवाहा प्रिया आनंद यादव बैच, मझौली टीम निवेदिता तनु जयसवाल बैच,फिर अनुपमा कुशवाहा पल्लवी नम्रता अनूप दीपक राहुल राजभर बैच

और अंतिम में अभिषेक, नीरज सबा, काजल,अर्पिता,आकांक्षा स्तुति चंदन अनशुमान,

डी एल एड में ज्योति गुप्ता Ankit Verma Saddam Hussein chandani pandey batch,deepak sarita कुशवाहा ,रमेश गुप्ता इत्यादि बैच,फिर अंजन गुप्ता सौरभ आंचल शाही बैच, पूजा यादव, अर्चना यादव सुरभि बैच ऐसे ऐसे नामों से दर्ज हैं।

जुदा होने वक्त कमियां कम दिखती जाती हैं और अच्छाइयां सफरनज़र आने लगती हैं।
कमियां धुंधली होती जाती हैं अच्छाइयां साफ नज़र आने लगती हैं।

हर बैच ने कुछ न कुछ सिखाया हमें,तमाम तरह के छात्र छात्राएं मिली, सबकी सोच अलहदा थी ।सब युवा थे , ऊर्जा के अजस्त्र स्त्रोत स्टैनली हॉल के शब्द में तूफ़ान की अवस्था वाले,कुछ शरारती कुछ गंभीर कुछ लिबरल कुछ अक्रामक कुछ अंतर्मुखी कुछ बहिर्मुखी सबके साथ इंटरेक्शन रहा।सबके व्यक्तित्व को समझने का मौका मिला। हर ism या वाद के हिमायती बच्चे, कुछ तो इतने भोले कि याद पर के आंख भर आती है। समग्र भारत जैसा माहौल रहता था एकदम विविधता पूर्ण पर हमारे विभागाध्यक्ष जी सबको लेकर चलते थे।एक ऐसे जहाज के कैप्टन थे जिसके हिस्से कटु आलोचनाएं ज्यादा आती थी। किंचित ही कोई छात्र छात्राएं उन्हें पढ़ते हुए पसंद की हों, हालंकि विदा होने के बाद सभी छात्र छात्राएं उनको आदर्श अभिवावक का स्थान देते हैं जिसके डांट फटकार और कड़े अनुशासन द्वारा उनके व्यक्तित्व में मजबूती आयी है।

हम अध्यापकों की नीरीहता तो देखो,हम किसी छात्र को कम ज्यादा स्नेह भी नहीं रख सकते क्योंकि प्रेम मिश्रित ईर्ष्या उत्पन्न हो ही जाती थी।
हमेशा स्नेह दिखाने मेभी सतर्क रहना पड़ा हम सबको ही।कब कौन किस वाद का आरोप लगा दे।
मैं अपने को इतना खुशनसीब समझता हूं कि पिछले सात सालों में अपने विभाग समवेत मुझ पर ब्राह्मण वादी, गांधीवादी,राष्ट्रवादी कभी कभी कम्युनिस्ट कभी हिंदूवादी कभी मुस्लिम परस्त,महिलावादी हर तरह के आरोप लगे।

आज ये सब लगता है जैसे की सब सम्मान जैसे ही था,उलाहना के कारण ऐसा करते थे सब। सारे छात्र छात्राएं मुझे पसंद करते थे हैं और मैं भी उन्हें पसंद करता रहा।उन्हे प्यार से मैं नालायक बुलाता था,सब प्यार से मुझे पता नहीं क्या बुलाते थे।

अजीत पाठक जी की नैतिकता और आदर्शवादी सोच , देवेंद्र शुक्ल जी की व्यवहारिक व आर्थिकी सोच , पवन सिंह जी की शांत चित्त धैर्य शाली व्यक्तित्व,कन्हैया जी की कड़क मिजाज और गणित जैसे तीक्ष्ण परिणाम वाली दृष्टि,कविता जी ग्राम्य जीवन से इतर महिला की सौम्यता भरी नगरी ईमानदार व्यक्तित्व और परवीन जी की उर्दू जैसी शहद मिश्रित व्यक्तित्व और अंत में हमारे विभागाध्यक्ष जी के विशाल अनुभव व प्राचीन अर्वाचीन व आधुनिक शीलगुणो से युक्त हृदय का सानिध्य प्राप्त हुआ।

इन सब का मेरे ऊपर बहुत बड़ा प्रभाव है।जिसकी झलक गाहे बेगाहे देखने को मिल जाती है...


विदा लेने के पहले कहे गए सारे शब्द झूठे हैं,विदा लेने की कल्पना ही मात्र सत्य है....

आंखे भरी हुई हैं,कोई भाव रुक नहीं रहा ... लिखना कुछ और चाह रहा हूं लिखा कुछ और ही रहा हैबहुत कुछ है जिसे मैं कहना चाहता हूं लिखना चाहता हूं पर लेखनी जवाब दे दे रही।वाक्य विन्यास में त्रुटियां हो रही हैं 

विदा लेता हूं महाविद्यालय

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