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विद्यालय में एक दिन

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सुबह की हल्की ठंड के बीच जब मैं स्कूल पहुँचता हूँ, तो बच्चों की चहल-पहल शुरू हो चुकी होती है। कुछ बच्चे स्कूल के गेट के पास खड़े गप्पें मार रहे होते हैं, तो कुछ बिना जूते-चप्पल के मैदान में दौड़ लगा रहे होते हैं। उनके कपड़े धूल से सने होते हैं, यूनिफॉर्म के बटन टूटे हुए या गायब होते हैं—या तो खेल-खेल में या किसी झगड़े में। मैं कक्षा में पहुँचता हूँ और उपस्थिति रजिस्टर खोलता हूँ। नाम पुकारता हूँ, लेकिन कई बच्चे गायब हैं। यह कोई नई बात नहीं है। बहुत से बच्चे सिर्फ नाम लिखवाकर गायब हो जाते हैं—कुछ दिन आते हैं, फिर महीनों तक नहीं दिखते। परीक्षा के समय भी कुछ बच्चों को कोई दिलचस्पी नहीं होती, जैसे यह उनके लिए कोई मायने ही नहीं रखती। रोज होमवर्क के लिए चिल्लाता हूँ।चार पांच लड़कियां और एक या दो लड़कों को छोड़ कर पूरी कक्षा नील बट्टे सन्नाटा में रहती है।कुल इकहत्तर बच्चों में से तीस ये चालीस उपस्थिति रहती है।जब भी होम वर्क के लिए कहो सब चुप, "क्यों, होमवर्क क्यों नहीं किया?" "सर, समय नहीं मिला," "घर में काम था," "किताब नहीं है," कोई यह नहीं कहता कि ...