भारत माता ग्राम वासिनी
#भारतमाता_ग्राम_वासिनी
खेतों में फैला है श्यामल,
धूल भरा मैला सा आँचल,
गंगा यमुना में आँसू जल,
मिट्टी कि प्रतिमा उदासिनी।।(सुमित्रानंदन पन्त)
भारत गाँवों का देश है।2011 की जनगणना के अनुसार 68.85% जनता अर्थात् लगभग 83 करोड़ लोग गाँवों में रहते हैं।वर्तमान समय में 640 जिले हैं तथा इन जिलों में 6.49 लाख के करीब गाँव हैं।ये गाँव ही पूरे भारत के लिए भोजन पैदा करते हैं।ये गाँव ही इन नगरों-महानगरों के लिये मजदूर और मानव-संसाधन उपलब्ध कराते हैं।
स्वतंत्रता के बाद गाँवों की स्थिति में सुधार अवश्य हुआ परन्तु नगरों की तुलना में बहुत कम।सड़क-बिजली गाँवों तक भी पहुँचा।आज की स्थिति यह है कि(लाक-डाउन से पहले)प्रत्येक मिनट में 25-30 लोग गाँव से नगरों की ओर बेहतर जीविका के लिए पलायित हो रहे थे।
नेहरू जी भारत को पश्चिमी देशों की तर्ज पर विकसित करना चाहते थे।परन्तु यह भारत जैसे विविधतापूर्ण देश के लिए कठिन व अप्रासंगिक था।स्वतंत्रता के बाद महात्मा गाँधी का ग्राम-स्वराज पुस्तकालय की अलमारियों के ठण्डे बस्ते में डाल दिया गया।गाँधी का भारत स्वावलंबी गाँवो का भारत था,जहाँ प्रत्येक गाँव एक राष्ट्र की भूमिका में होता।विनोबा भावे का भूदान यज्ञ और दीनदयाल उपाध्याय का अन्त्योदय कार्यक्रम पूरी तरह से गाँवों के स्वावलम्बन तथा गाँवों के मौलिक विकास के लिए अभिप्रेरित करने वाला था।परन्तु इनके अनुयायियों ने भारत का प्रतिदर्श गाँव को न मानकर नगरों का मानना शुरू कर दिया।आज गाँधी का ग्राम स्वराज पुनः प्रासंगिक हो उठा है।नगर तबाह हो रहे हैं।नगरों की ऊँची अट्टालिकायें ललचायी आँखों से ।गाँव आज भी अपनी मस्ती में है।
संविधान निर्माण के समय भी गाँवों को भी ना तो प्रशासनिक ना ही विधायी और न ही स्वावलंबन के अधिकार दिये गये।2005 में भारत सरकार ने पहली बार स्वावलंबन के लिए महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम (मनरेगा / MNREGA)लागू किया।यह अपने आप में विश्व की पहली ऐसी योजना थी जिसमें गाँव को विकास(नगरों की तर्ज पर नहीं)मसलन बागवानी,सड़क निर्माण,पोखरे तथा कुंआ का निर्माण व मरम्मत इत्यादि रखा गया है।परन्तु यह योजना भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ गयी।बढ़ती मंहगाई और गिरती हुई मुद्रा के इस दौर में इसके तहत मिलने वाली मजदूरी बहुत कम लगभग 200 ₹ प्रति कार्यदिवस है।यह योजना प्रशासनिक लापरवाही व अकुशल क्रियान्वयन के कारण भ्रष्टाचार का केन्द्र बन गयी।
डब्ल्यूएचओ के मुताबिक प्रत्येक दो हजार की आबादी पर एक चिकित्सालय होना चाहिए परन्तु गाँव में दो लाख की आबादी पर एक चिकित्सालय है।जहाँ राज्य व केन्द्रकर्मचारियों का वेतनमान औसतन दस साल में दोगुना तथा वहीं किसानों व मजदूरों की की मजदूरी बीस में दोगुनी नहीं हो पा रही है।
वस्तुतः गाँव आज केवल कच्चा माल तथा मानवीय संसाधनों का निर्यातक मात्र बन कर रह गया है।
आखिर क्यों ?क्यों गाँव आज हाशिये पर है?उच्च शिक्षा संस्थान,अत्याधुनिक विशेषज्ञता पूर्ण चिकित्सालय क्यों नहीं बने गाँवों में? क्यों सन् 1951 में कृषि का योगदान जीडीपी में योगदान 50% तक था,आज क्यों 14-17% तक पहुँच गया?
गाँव के कुटीर व लघुउद्योगों का सुनियोजित तरीके से बहुराष्ट्रीय कम्पनियों की कीमत पर गला घोंट दिया गया।एक छोटा सा उदाहरण प्रस्तुत कर रहा हूँ।आलू के मौसम में उचित नियमन तथा नियंत्रण न होने के कारण एक औसत आलू की कीमत लगभग पचास पैसे होती है।इसे किसान बड़ी मंडीयो तक ले जाता है बहुराष्ट्रीय-राष्ट्रीय कम्पनियाँ इस आलू को खरीदती है।जीविका की तलाश में इन्हीं गाँवों से श्रमिक शहरों में जाते हैं।इन्हीं आलू के फैक्ट्री में काम करते हैं और एक आलू में एक पैकेट चिप्स तैयार होता है जिसकी कीमत होती है पाँच रूपये।पुनः यही चिप्स के पैकेट गाँवों में टी वी के माध्यम से विज्ञापित कर बेचने के लिये भेज दिया जाता है।
बीस पैसे का आलू चमकीले रंग-बिरंगे पैकेट में पाँच रूपये में बिकता है।(इसमें तमाम लोगों को रोजगार व टैक्स भी शामिल है फिर भी)
जरा सोचिये!किसान ने आलू उगाया।परिवहन खर्च कर मंडियों तक ले गया।वहां चिप्स बना पुनःविभिन्न डीलर,होलसेलर,खुदरे व्यापारीयों को मुनाफा देते हुए गाँव के बच्चों के हाथों में पहुँचता है।मतलब गाँव ने पचास पैसे का आलू दिया और पाँच रूपये में खरीदा।
क्या गांवो में चिप्स की फैक्ट्री नहीं लग सकती?
ठीक इसी प्रकार तमाम उत्पादों को गाँवों से छीन कर टीवी के रास्ते फिर गाँवों को बेचा गया।अब गाँव पर आधारित अर्थव्यवस्था का विकास ही विकल्प बच रहा है।श्रमिकों के पलायन और प्रवास की समस्या के जिम्मेदार सभी सरकारें रहीं हैं।
Comments
Post a Comment