डायरी

कल कितने दिन के बाद तुम्हारी आवाज सुनी...आश्चर्य मिश्रित असहजत्ता उत्पन्न हुई।।चुप्पियां अतीत में गोते लगाती हैं,भविष्य के दुस्वप्न बुनती हैं और वर्तमान खा जाती हैं।दुखों के अंबार में क्षणिक सुख, दुख की तीव्रता कम नहीं करता अपितु बढ़ा 
देता है ठीक उसी तरह जैसे आषाढ़ की गर्मी में हल्की वर्षा उष्णता को कम नहीं करती वरन और बढ़ा देती है।विदा लेना या देना,वियोग से भी अधिक कष्टप्रद होता है। दुःख और डर में डर बड़ा होता है।वियोग का दुख,वियोग के डर के तुलना में कुछ भी नहीं।

जीवन की यथार्थता हमें जीवन से ही अलग करने का प्रयास करती है।परिस्थितियां प्राथमिकताएं तय करती हैं, हम नहीं।बचपन में एक कहानी सुनी थी कि मां ने बेटे और पति को लड्डू दिया।पति को पूरा लड्डू और बेटा छोटा था तो उसे आधा लड्डू।बेटे ने कहा नहीं चाहिए ये लड्डू और लड्डू उठा कर फेंक दिया।मां समझदार होती है उसने आधे लड्डू को गोल कर छोटा लड्डू बना दिया।बेटा खुश हो गया।आज इस कहानी का मतलब समझ में आया।



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