चेन्नई डायरी
(दो साल पहले)
यात्रा का अंतिम दिन है।हमलोग ऊटी से वापस आ गए हैं। चेन्नई रेलवे का सहायक स्टेशन है पेरंबूर, यहीं से शाम को संघमित्रा एक्सप्रेस पकड़नी हैं , सुबह सुबह ही पहुंचे हैं यहां। यहां का स्टेशान स्वच्छ है, लेकिन शौचालय एक ही है और गंदा है। फ्रेश होकर, मैं और अंशु दोनों चाय के लिए बाहर निकले हैं। एक चाय की टीटपरी दिखी है। चाय बनाने का तरीका कुछ अलग सा है चाय पत्ती को पानी में उबाल के रखा है, दूध और पानी अलग ही उबाल के रखा है। जिसे गिलास में डाल कर फिर उबली चाय के पानी को mix करते हैं, अंत में स्वादानुसार शक्कर मिला कर दे देते हैं। चाय और बिस्कुट ले कर हम लोग फिर स्टेशन पर आ गए हैं। अंशु काफी केयरिंग लड़का है। हमलोगों का अपना टूरिस्ट गाईड भी है।
नेट पर आसपास घूमने वाली जगह खोजा जा रहा है। एक राजीव गांधी मेमोरियल दिखा रहा और इक कोई विवेकानंद जी से संबन्धित कोई जगह, एक चार्जिंग प्वाइंट देखकर हम लोग वो जगह छेका लिए हैं। आराम से बैठ कर स्टेशन पर चारो तरफ देख रहा हूं । धीर धीरे लोग आ रहे। चारो ओर भोजपुरी में बात करते लड़कों को देख कर मन खुश हो गया है। पिछले दस दिन से तमिल सुन के उकता गए थे।एकदम अपना स्टेशन लग रहा है, मने पूर्वांचल का।। कुछ बेंच पर बैठे हैं। कुछ गोला बना कर निचे फर्श पर भी बैठे है ,सब अपने अपने झोरा बोरा में से खाने पीने वाले समान निकाल कर खा रहे या इधर उधर रख रहे हैं। चारो ओर फोन पर भी हिंदी भोजपुरी मिक्स बात चल रही है ।
कोई भी तमिल में बात नहीं कर रहा,सब भोजपुरी एक्सेंट में हिंदी में बात कर रहे हैं। लगभग सभी मजदूर जैसे ही लग रहे ।मेरे पीछे के चबूतरे पर एक लड़का बैठा है जो अपने गांव वाले को गाली दे रहा है कि क्यों उसने अफवाह उड़ाई है कि वो लड़की ले कर चेन्नई भागा है। अंशु एक तीखी नमकीन का पैकेट लाया है।खाने का मन नहीं है तो हमने पीछे लगे पोल के पास रख दिया है। ट्रेन लगातार लेट हो रही है,मन जो देवरिया सलेमपुर सिवान जैसा स्टेशन पा कर आह्लादित था भोजपुरिया लोगों को पा के,अब झुंझलाहट हो रही फ़िर भी ठीक ही लग रहा क्योंकि अब तो घर जाना है।
मैं ध्यान से भीड़ को देख रहा हूं।सारे नवयुवक हैं यानि अधिकतम चालीस के कुछ लड़के तो सोलह सत्रह के भी हैं।मेरे कान सुन्न हो रहे ,जैसा बड़े धमाके के बाद होता है।इस कोलाहल में मुझे पीड़ा और दुःख का स्वर सुनाई दे रहा।इन सुकुमार बच्चों को देख कर कलेजा फट रहा।कैसे इन्हें मां बाप ने विदा किया होगा। सोलह सत्रह साल के बच्चे स्कूल से लेट होते हैं तो घरवाले चिंता में पड़ जाते हैं,वे बच्चे कमाने के लिए भेजे गए हैं या खुद आए हैं। हल्की हल्की मूंछों के निशान है,मुझे भईया का चेहरा दिख रहा इनमें।वे भी बीस की उम्र में सूरत चले गए थे कमाने। कैसा देश बना दिया है नेताओं ने ,तीन तीन हजार किमी की यात्रा कर के आठ दस हजार रुपए कमाने के लिए लोग मां बाप घर परिवार छोड़ के आ गए हैं।रोटी की कीमत इतना भी अधिक नहीं होना चाहिए,सांस फूल रही है मेरी,इस भीड़ के चेहरे मेरे गांव से मिल रहे हैं।मेरा बहुत जोर का मन हो रहा कि किसी एक से बात कर लूं , उसे थोड़ा सा सांत्वना दे दूं।
कोयंबतूर जाते समय भी ट्रेन में भी एक बच्चा मिला था,उसका नाम था प्रवीन, हमलोगों ने अपने पास बैठा लिया था। भोलू ने कुछ खाने को भी दिया उसे, भोलू भी अति गरीब पृष्ठभूमि से है तो वह भी गरीबी जानता है और इन मामलों में दयालु है ।बात किए थे तो पता चला कि अपने जीजा के पास जा रहा था तीरपुर। मम्मी उसकी भेजी थी,एक छोटा सा बैग नुमा झोला था उसके पास।एक मटमैला टीशर्ट पहने हुए था। उमर करीब चौदह साल रही होगी, घर एक छोटा भाई और एक बहन थी उसकी। अध्यापन पेशे से हूं तो पढ़ाई पूछ लिया तो बताया था कि नाइंथ की परीक्षा दे चुका था।हम भोजपुरी भाषी लोगों को साथ पा कर थोड़ा चहक उठा था। भोलू उसे घुला मिला लिया था। एक कीपैड वाला छोटा सा फोन लिए था।बोला कि तिरुपुर उतर कर जीजा को कॉल कर लूंगा।हम लोग घूमने के लिए और वो रोटी के लिए निकला था,ये guilr अब भी मेरे मन में है।
उसकी छवि बार बार मन में आ रही।अंततः एक लड़के से ट्रेन लेट होने के कारण पर अनायास बातचीत शुरू हो गई है।ये भी लड़का दोस्त की सहायता से दोस्त के साथ घर वालों को बिन बताए भाग के आया है।एक दम नए नए से तीन दोस्तो का ग्रुप है ये। मालिक हिसाब नहीं कर रहा था तो बीस पच्चीस दिन की पगार छोड़ के भाग चले हैं सब।बातचीत में थोड़ा हंस बोल के लड़के बात किए तो मन शांत हुआ मेरा।
सारी जवानियां भर भर के ये ट्रेनें ले कर चली आती हैं,घर पर रह जाते है बूढ़े मां बाप,छोटे बच्चे,भाई बहन या अकेली पत्नी।मैं मन ही मन नेताओं को बुरा भला कह रहा कि क्यों ऐसे किए तुम लोगों ने,
ने हरू, ला लू , नी तीश,यो गी से लेकर मो दी तक का चेहरा ,घूम गया सामने।
मुझे अपनी यात्रा याद आ गई जब मैं भी नौकरी के लिए निकला था गुजरात।उस पीड़ा में डूब गया। कैसे घर याद आता रहा था।घर में का कोने में पड़ा झाड़ू,दीवार की दरारें,नाली के मुहाने पर पड़ा हुआ ईंट का टुकड़ा... मम्मी का घिसा हुआ चप्पल ,पापा का पट्टे वाला जांघिया... मतलब वो हर चीज याद आती थी जो अमूमन घर पर रहने पर अनदेखी रह जाती हैं।
मैं सभी प्रवासियों के प्रति कृतज्ञता से भर उठा हु।आंखे भरी सी हैं,मन एक रिक्तता से भरा हुआ है। आंखे अस्थिर होकर इधर उधर घूम रही हैं। मेरे मन से घूमने से प्राप्त उल्लास जा चुका है।
कितना कठिन है ये जीवन जिसमें अपनों के पेट के लिए अपनों को छोड़ के सुदूर परदेश में जा कर मजदूरी करनी पड़ रही है,मेरे अपने दुःख तिरोहित हो चुके हैं।मैं जड़वत हो गया हूं,पिछले बारह घण्टे में मात्र तीन बार तीन चार मिनट के लिए अपनी जगह से उठा हूं।
भोलू अपने दोस्त के यहां गया था ,बैग लाने।वो वापिस आ गया है ।
हमलोग अपने बैग उठा लिए हैं,नमकीन का पैकेट छोटी हो चुका है,रात के साढ़े दस बज चुके हैंट्रेन बारह घंटा लेट होकर आ चुकी है प्लेटफॉर्म पर....
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