उसकी ज़िंदगी में हर मौसम असमय आया। बचपन जल्दबाज़ी में छोड़ गया और प्रौढ़ावस्था ने जवानी को निगल लिया। सतरंगी सपनों वाला वसन्त उसकी देहरी पर रुका ही नहीं। मासूमियत से वयस्क होने का सफ़र कुछ ऐसा ही तीव्र था जैसे फलों सब्ज़ियों की उँगली के पोर जितनी जीरी को ज़बरन ऑक्सीटोसिन का इंजेक्शन देकर रातोंरात परिपक्व कर दिया गया हो।
ऐसे में उम्र का हिसाब नहीं रखता कोई, बस दिखाई देती हैं आँखों के नीचे काले घेरे और झुर्रियाँ जो उपजाऊ चमड़ी देखकर हर तरफ़ उग आईं थीं। कितने सावन बीते पता नहीं, वो अपने कुकून में बन्द रही। उसे अपना घेरा सुरक्षित लगता, कौन जाने बाहर कौन सा ख़तरा सामने आ खड़ा हो, रिस्क कौन ले। धीरे धीरे वो एगोराफोबिया की गिरफ़्त में कसती गयी। वह मानसिक स्थिति जिसमें इंसान, घर से निकलने, किसी ने मिलने जुलने से इस हद तक डरने लगता है कि पैनिक अटैक आने लगते हैं।
ऐसे में एक दिन अचानक उसकी मेज़ पर रखा पुराना और अधिकतर ख़ामोश ही रहने वाला गोल डायल वाला फ़ोन बजा। हैरानी से फैली उत्सुक आँखों और हमेशा चुप से रहने वाले माहौल को चीरती घन्टी की आवाज़ से धड़कता कलेजा लिए उसने रिसीवर उठाया। दूसरी तरफ़ से खनखनाती आवाज़ आयी, कोई उसके उत्तर की प्रतीक्षा किये बिना बोलता ही जा रहा था, घबराहट में वो बीच में टोक भी न पायी। बिना विराम चिन्ह के लम्बी बातों के बाद वो आवाज़ रुकी, हिम्मत करके उसने कहा, रॉंग नम्बर।
पर यह सिलसिला रुका नहीं... जाने क्यों बेवज़ह ही वो रॉंग नम्बर आता रहा और बिना प्रत्युत्तर के भी आवाज़ खनकती रहती। मिनट घन्टों में बदले, अब उस आवाज़ का इंतज़ार रहता इसे। वह आवाज़ इससे कुछ न पूछती न ये अपने बारे में बताती, बस सुनती रहती। सूखे होंठ मुस्कराना सीख गए थे, उस चहकती जीवंत आवाज़ ने इसके वीरान जीवन की टिमटिमाती लौ में तेल डाल दिया था।
वह अपने बारे में सबकुछ सुनाता, अब यह उसे, उसके दोस्तों, परिवार, कलीग, पसन्द, नापसन्द, दिनचर्या सबके बारे में सबकुछ जानती थी। उसे चाय में मीठा कम चाहिए, उसे खाना गर्म नहीं खाया जाता, वो इतना आलसी है कि कमरा बिखेरे रहता है, पिता से झिड़कियाँ सुनता है, मतलब सबकुछ। बातों से उसे यह भी अंदाज़ लग गया था कि वह कम से कम बारह पंद्रह साल छोटा तो होगा। पर इसकी ख़ुद की मनःस्थिति इसे उम्र से ज़्यादा खोखला कर चुकी थी।
उसको लेकर कोई सपने नहीं बुने, न कोई परीलोक के किस्से जगे, पर फिर भी अब उसकी बातों के बिना न सुबह होती न शाम ढलती। पर बदले में देने के लिए इसके पास कुछ न था, न सपने न खुशियाँ, न आश्वासन। एक दिन वही हुआ जिसका डर था, उस आवाज़ ने मिलने की इच्छा जाहिर की और अब तक थोड़ा पीछे धकेला गया डर अपनी पूरी धज के साथ उसके सर पर सवार हो गया। फोन हाथ से गिर गया, जमीन आसमान सब गोल गोल घूमने लगे। उसी नीम बेहोशी और पैनिक में कई दिन गुज़रे... दवा दुगनी निगल ली गयी पर दिल को न संभालना था.. न सम्भला।
इस बीच कई राउंड घन्टी बजी और इग्नोर कर दी गयी। कई रतजगों के बाद आख़िर हिम्मत कर के टेबल तक कदमों को खींच ले गयी और सादे पन्नों पर कलम घसीटने लगी। कमज़ोरी और नींद की कमी से धुंधली पड़ती नज़रों पर आँसू और पर्दा डाले दे रहे थे पर अनुमान से ही वो लिखती रही, पन्नों के पन्ने भरते रहे, उसने हर चिट्ठी में कलेजा निकाल कर धर दिया, स्याही आँसुओं से फैलते रहे और उंगलियों ने कलम को तबतक घसीटना जारी रखा जबतक पूरी तरह से होशोहवास गुम होकर वह कुर्सी से नीचे फ़र्श पर न फिसल गई।
वैसे ही पड़े हुए कब सुबह हुई, कब माली ने अहाते में से झाँक कर शोर मचाया, कोई ख़बर नहीं। घर का दरवाज़ा तोड़ कर जब पड़ोसी और माली पहुँचे तो वो फ़र्श पर बिछी दरी पर सफ़ेद कपड़ों में लिपटी चेहरे पर सुकून लिए हमेशा के लिए सो चुकी थी। टेबल और आसपास कागज़ बिखरे हुए थे। दाएं हाथ की उंगलियों में कलम फँसा हुआ था और बायीं हाथ की मुट्ठी में एक पुर्जा जिसपर एक नम्बर लिखा था।
लोगों ने उस नम्बर पर फ़ोन किया और हालात बताए,पता ठिकाना बताया.... उधर अब सन्नाटा था। शाम तक वो इसके कमरे में था, निर्जीव देह अब बिस्तर पर अंतिम प्रयाण की प्रतीक्षा में थी। उसने उसके चेहरे और हाथों की झुर्रियों को कोमलता से सहलाया और हथेलियों को अपने दोनों हाथों में भर कर बच्चों की तरह फूट फूट कर रोने लगा। अबतक टेबल पर बिखरी उसके नाम की सारी चिट्ठियों को किसी ने समेट कर रख दिया था और उसपर ताज़े फूल सजा दिए थे।
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