मौन
तुम्हारे ना और मेरे हाँ के बीच की समतल जमीन पर मैंने एक ख्वाब उगाया था जिसकी जड़ें तुम्हारे रूह
तक जरूर पहुँचती होंगी ..
कितनी साफगोई से झूठ
बोल गये खुद से जबकि तुम्हे भी ये खबर थी आँखे झूठ नहीं बोलती..
सहमी सहमी अंगुलियों का
झूठा स्पर्श
शब्दों की नीरीहता
और तुम्हारा एकाग्रचित्त मौन
सब झूठे हैं,
तुम भी वहीं खड़े हो
मैं भी वहीं खड़ा हूँ
हमलोगों की बीच की दूरी
बढ़ती चली जा रही
किसी दरार के दोनों किनारों की तरह..
बस इक सच है तो है
तुम्हारा होना..
- अतुल पाण्डेय
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