ये अँधेरा बहुत डराता है 
जबकि इसका होना ही शाश्वत है/
बचपन में कहे गये शब्द 
अंधेरा काट लेगा
का निहितार्थ जमीन पर उतरता है/ 
शनैः शनैः हाथ बढ़ाता है/
तमाम फैले हुए खेतों पहाड़ो जंगलों की ओर
परछाईयां लम्बी होती जाती हैं, 
रंग स्याह होता जाता है /
कितना मुश्किल होता है टटोलना सब कुछ
लेकिन टटोलना भी शाश्वत है/ 
सदैव टटोली जाती रही है 
जेब से लेकर हृदय तक
शब्द से लेकर भावों तक
स्पर्श ही लक्ष्य है/
स्पर्श की अपनी आँखे हैं 
इसकी अपनी भाषा है
हाथ भी छूटते हैं और रिश्ते भी 
कितना मुश्किल होता है 
किसी पहलू का अनछुआ होना....
#यायावर

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