criminal&justice: behind the door

क्रिमिनल जस्टिस सीज़न 2 : बिहाइंड द क्लोज्ड डोर

 
यह एक गुणवत्ता परक समसामयिक वेब सीरीज है,जिसे अवश्य ही देखा जाना चाहिए।पंकज त्रिपाठी के उत्कृष्ट अभिनय से आच्छादित यह वेब सीरीज ने एक बहुत ही महत्वपूर्ण विमर्श खड़ा करती है।इसका शीर्षक 'अपराध और न्याय:बन्द दरवाजे के पीछे'।अपराध क्या है और अपराधी कौन है?न्याय क्या है और न्याय कैसे मिलता है,यह एक व्यापक विमर्श है।सर्वोच्च न्यायालय ने भारतीय दंड संहिता की धारा 497 में वर्णित व्यभिचार (एडल्ट्री) को अपराध की श्रेणी से बाहर करते हुए इसे एक सामाजिक बुराई (अनैतिक कार्य) के रूप में उल्लेखित किया है। क्या नैतिकता और कानून में एकरूपता होनी चाहिए? क्या नैतिकता ही कानून का आधार होनी चाहिए? प्रथम प्रश्न के संदर्भ में, चूंकि नैतिकता की सामाजिक स्वीकार्यता होती है इसलिए नैतिकता और कानून में साम्य होने से कानून का पालन आसानी से होता है। वहीं नैतिकता अर्थात सामाजिक स्वीकार्यता के अभाव में कानून का पालन कठिन हो जाता है।नैतिकता और कानून में विरोधाभास से सामाजिक तनाव की स्थिति पैदा हो सकती है क्योंकि कानून को बनाने व लागू करने वाले अंग भी समाज से आते हैं अतः, पुलिस और सरकार भी  कानून को लागू करने में 'अपने सिद्धान्त तथा अपने मानदंड' का सहारा लेते हैं ।यह उक्ति चरितार्थ होती दिखी इस सीरीज  में कि कैसे एक पुलिस अधिकारी न्यायिक जांच तो सही दिशा में करता है पर जाँच से परिणाम अपने माइंडसेट के मुताबिक निकालता है। इस प्रकार अपराध,न्याय और नैतिकता सभी पहलू धुंधले हो जाते हैं।इनमे से जिसकी पैरवी, दखल, पकड़ ,तर्क या शक्ति अधिक होती है वो ही जीत जाता है।यह वेब सीरीज उन तमाम अपराधों की कहानियों का प्रतिनिधित्व करती है,जो बंद दरवाजों के पीछे दफ़न है।वे वो कहानियां हैं जो किसी तथाकथित 'आदर्श पत्नी' के दमघोटूं किरदार के नारकीय जीवन की यंत्रणा के नेपथ्य में रची गयीं हैं।विक्रम यहीं पाये जाते हैं।हम लोगों के बीच ही रहते हैं,समाज उनको आदर्श पति के नाम से जानता है,पर वह अपनी पत्नी की नज़र में एक सामान्य पति होने की योग्यता रखता है या नहीं यह प्रश्न अभी तक अनुत्तरित है।ये सभी कहानियां क्रिया-विशिष्ट हैं जो विवाह नामक सामाजिक अनुबंध के नाम पर आजतक व्यापक रूप से उचित सिद्ध की जाती रही हैं।एक ऐसा अनुबंध जो स्त्री की देह के स्वामित्व का अधिकार पुरुषों को देता रहा है।जहाँ स्त्री पुरुष की दैहिक तृप्ति के एक उपकरण के रूप में भी कार्य करती है तथा उस उपकरण से स्वयं को यादृक्ष्या संतुष्ट करना,पुरूष अपना अधिकार समझाता है।वहीं स्त्री को समाज-घर-परिवार द्वारा इस बात के लिए शुरुवात से ही सिखाया जाता है कि परिवार चलाने की जिम्मेदारी स्त्रियों की है और उन्हें यह काम सब कुछ सहते हुए करना चाहिए।उस स्त्री के मनोस्थिति की कल्पना करना भी कठिन है जो अपने बिस्तर पर ही असुरक्षित है।
इस वेब सीरीज की कहानी इन्ही परिस्थितियों के चारो ओर बुनी गयी है जिसके मुख्यतः चार आयाम हैं।पहला मैरिटल रेप दूसरा आरोपी का मीडिया ट्रायल और तीसरा पुरुष प्रधान समाज द्वारा अनुकूलित महिलाओं की भूमिका तथा अंतिम चौथा महिला सुरक्षा व घटिया न्यायिक प्रक्रिया।

पहला आयाम:इस में विवाहिता अनुराधा चंद्रा जो एक जाने माने वकील विक्रम चंद्र जिसकी बाहरी दुनिया में छवि सौंम्य तथा देखभाल करने वाले की है,की पत्नी है।विक्रम अपनी पत्नी का कई सालों से बलात्कार करता है और अपनी फैंटेसी के अनुसार उसे यौन संबंध बनाने के लिए बाध्य करता है।अनुराधा चंद्रा अपने ही घर में प्रतिपल सब सहते हुए घुट-घुट कर जी रही है।
दुर्भाग्य से अभी तक हमारे देश में वैवाहिक बलात्कार(मैरिटल रेप) को बलात्कार तक नहीं माना जाता।आखिर मैरिटल रेप हमारे कानून में अपराध क्यों नहीं है?जबकि माननीय कोर्ट मानती है कि असहमति से बनाया गया हर शारीरिक संबंध बलात्कार है।किसी महिला से उसकी इच्छा के बिना शारीरिक संबंध बनाना रेप यानी बलात्कार माना जाता है। यह कानूनन अपराध है जिसके लिए भारतीय दंड संहिता में सजा का प्रवाधान है। लेकिन भारत में पति अपनी पत्नी की मर्जी के बिना उसके साथ जबरदस्ती तथा अप्राकृतिक शारीरिक संबंध बनाता है तो उसे अपराध नहीं माना जाता। यानी भारत में वैवाहिक बलात्कार या मैरिटल रेप कानूनन अपराध के दायरे से बाहर है। 
सन 2017 में तत्कालीन केंद्र सरकार ने वैवाहिक बलात्कार को अपराध मानने से इंकार कऱ दिया और कहा कि ऐसा करना विवाह की संस्था के लिए खतरा साबित होगा।

ऐसी संस्था को अस्तित्व में रहने का कोई अधिकार नहीं जो किसी प्रजाति के शोषण पर टिका हो।ये पितृसत्तात्मक व्यवस्था तथा पुरुषप्रधान समाज के पाये सदियों से स्त्रियों के तथाकथित कर्तव्य पर टिके है।कोई भी व्यक्ति या संस्था अलोचना से परे नहीं है,जिसके अस्तित्व की समीक्षा न की जा सके।

दूसरा आयाम: आज के समसामयिक परिवेश में किसी भी हाइ प्रोफाइल केस का न्यायालय के सामानांतर मीडिया ट्रायल होने लगा है (जिसे हम रिया-सुशान्त केस में हम देख चुके हैं,एक आत्महत्या को किस ढंग से मीडिया और उसकी संचालक सत्ता द्वारा जनमानस को बौखलाने तथा अन्य महत्व पूर्ण मुद्दों को दबाने में किया गया।किस प्रकार एक आरोपी महिला रिया चक्रवर्ती को अपराधी के रूप में चित्रित कर उसका चरित्र-हनन व मानसिक उत्पीड़न किया गया।)।प्रभावशाली लोगों की दबाव में आधे अधूरे सच के साथ तथ्यों को तोड़ मरोड़ कर पब्लिक की दृष्टि में आरोपी को दोषी के रूप में तथा विलेन को हीरो के रूप स्थापित कर दिया जा रहा।सोशल मीडिया पर गालियों को ट्रेंड करा दिया जा रहा।उपरोक्त सभी दृश्यों के प्रतिविम्ब इस वेब सीरीज में मिलते हैं।
 इस वेब सीरीज में जब अनुराधा चंद्रा द्वारा अपने पति की हत्या का आरोप लगता है तो यहां मीडिया के वास्तविक चरित्र को दिखने का प्रयास किया है।मीडिया द्वारा स्वयं  motive के स्थान पर नैरेटिव गढ़ने को बखूबी दिखाया गया है।

तीसरा आयाम:यहाँ महिलाओं के महिलाओं पांच किरदार हैं,एक वकील दूसरी पुलिसकर्मी बाक़ी तीन आरोपी अनुराधा चंद्रा उनकी बेटी और उनकी सास।परिवेश द्वारा अनुराधा चंद्रा के बेटी के मस्तिष्क को अनुकूलित कराया जा रहा कि किसी महिला को जीवन के सुख -सुविधाएँ-विलासिता की वस्तुएं उपलब्ध कराना ही प्रेम करना है,उसका स्व कहीं मायने नहीं रखता।महिला अधिकार कार्यकर्ता मिसेज चंद्रा की बेटी से कहती है कि "तुम उन हैप्पी मोमेंट्स को याद करो जो तुम्हारे पिता ने तुमको दिए हैं।"
ठीक यही तर्क आम तौर पर इस प्रकार के पीड़िता को दिया जाता है कि तुम्हारे लिए मैंने क्या क्या किया है?या सब कुछ तो तुम्हारे लिए ही तो कर रहा हूँ।अर्थात् सुख-सुविधा-छत-भोजन की कीमत पर स्त्री के स्व की हत्या या उसकी गुलामी।
महिलाओं के अस्तित्व की इस लड़ाई में महिलाएं ही कहाँ खड़ी हैं।विचारणीय प्रश्न है।

चौथा आयाम:इस में हमारे न्यायिक सिस्टम की लचर और सड़ी हुई व्यवस्था को प्रदर्शित किया गया है कि किस प्रकार कभी कही पुलिस की लापरवाही और पूर्वाग्रह के कारण को आरोपी दोषी में बदल सकता है।जेल के अंदर का नारकीय परिवेश आरोपियों को अपराधी बनाने के लिए पर्याप्त है। 

 किसी स्त्री के सफल और आनंददायक जीवन के लिए उच्च आर्थिक स्थति तथा बड़े पदनाम युक्त परिवार का होना ही मात्र पर्याप्त नहीं है।भारतीय परिप्रेक्ष्य में माँ-बाप केवल यही देखकर अपनी बेटी का विवाह अपने से ऊँचे परिवार में कर देते हैं और इस सच को सहजता एवं सरलता से स्वीकार नहीं कर पाते कि मेरी संतान तमाम सुख सुविधाओं के बावजूद भी किसी दुःख या यातना में हो सकती है। 

ये नीचे के तीनों संवाद आपको उद्वेलित करने के लिए पर्याप्त हैं कि सदियों से इस देश में एक औरत के अस्तित्व को कैसे  दबाया गया है।यह दिखाता है कि अभी महिला अधिलारों के किये कितना संघर्ष करना बाकी है। 

पहला संवाद : अभियोजन पक्ष कहता है कि “हमारे कानून में मैरिटल रेप कोई जुर्म नहीं है।”

दूसरा संवाद :आरोपी की वकील कहती है कि "विक्रम एक अच्छा बेटा था,अच्छा पिता था,अच्छा मित्र था पर अच्छा पति नहीं था।"
ये बात कहीं न कहीं आम लोगों की तरह दिखने वालो में ही इस प्रकार के बलातकारी छुपे हुए हैं।

तीसरा संवाद : आरोपी के वकील की माँ कहती है कि हमे शुरू से ही यह सिखाया गया है कि घर चलाना स्त्रियों की ही जिम्मेदारी है।

तीनों संवाद सवाल तो खड़ा करते है कि सालों से इस देश में एक औरत के अस्तित्व को कितना दबाया गया है। लेकिन इसी समाज में कुछ ऐसे लोग भी हैं जिन्होंने अभी तक इस खूंखार और लिजलिजे सिस्टम के आगे हथियार नहीं डाले हैं।

यह संवाद बार-बार यह सवाल पूछते हैं कि आखिर मैरिटल रेप हमारे कानून में अपराध क्यों नहीं है?  पुरुष अच्छी पत्नी तो चाहते है पर अच्छे पति क्यों नहीं होना चाहते है?

©Atul pandey

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