प्रेमी की पत्नी


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कितनी खूबसूरत है नील की वाइफ 
चमकदार सांवली रंगत , बड़ी-बड़ी आंखें और दिलफ़रेब मुस्कान
चंदेरी की इंडिगो साड़ी में बहुत ग्रेसफुल लग रही थी
जब उस दिन ऑफिस की पार्टी में दूर कोल्ड ड्रिंक लिए बैठी थी 
बीच बीच में हमारी नज़रें टकरा जा रहीं थीं 
पर उसकी नज़र तक मुझे देख नहीं मुस्कुराई थी 
जबकि हम एक बार मिल चुके थे पहले

बहुत देर तक मैं सोचती रही
कि खुद जाकर उससे मिलूं या नहीं ? 
एक झिझक सी हो रही थी 
मन का गिल्ट बहुत उलझनें पैदा करता है
फिर लगा कि 
नहीं मिलूंगी तो कहीं इसे मेरे और नील के बारे में शंका ना हो जाये

मैं गयी तो थी उसके पास सिर्फ हाय हेलो करने
पर जाने क्यों उसे हग कर बैठी 
उसके स्पर्श में आत्मीयता बिल्कुल नहीं थी
बल्कि उसकी मुस्कान भी मुझे नकली लगी
शायद कुछ तो जानती है ये ....

वैसे नील कहता तो है कि पत्नी को कुछ नहीं पता 
मगर मैं एक स्त्री होने के नाते दूसरी स्त्री को जितना जान सकती हूँ
उतना कोई पति भी अपनी पत्नी को नहीं जान सकता।

मैंने नर्वसनेस में पति और बच्ची की बातें सुनाना शुरू कर दिया
वह हां हूँ कर रही थी पर शायद सुन नहीं रही थी
और इस बीच उसने मोबाइल टेबल पर रखा
जिसे देख मेरा दिल डूबने लगा ,रुलाई छूटने लगी
स्क्रीन पर नील था उसे होंठों पर चूमते हुए। 

अच्छा हुआ , वही वॉशरूम के बहाने उठकर चली गयी
नील भले ही ना माने 
पर अब मैं यकीन से कह सकती हूँ कि वह हम दोनों के बारे में जानती है

मैं भी भागकर अपने चेम्बर में गयी और खूब सारा रोकर बाहर आई
नील ने देखा मगर पत्नी के कारण मेरे पास भी नहीं आया

फिर मैं यकायक बेचैन हो उठी
क्या कर रही हूँ मैं ? 
वह भी तो नील से प्रेम करती होगी 
कितना दर्द और घुटन होगी उसके भीतर
मुझे सामने देखकर गुस्सा नहीं आया होगा क्या उसे ?
पर कितनी संयमित रही वह 
मैं खुद को उसका मुजरिम मान रही थी 

पर जब नील ही खुद को उसका अपराधी नहीं मानता
तो मुझे क्या ज़रूरत है इतना सोचने की 
मुझे अपने पति के बारे में सोचना चाहिए 
असल धोखा तो मैं उसे दे रही हूँ 

मैं कहां अपने पति के अलावा किसी से रिश्ता रखना चाहती थी
कबीर बहुत अच्छा पति है 
प्यार ,परवाह ,इज़्ज़त ! किसी चीज़ में ज़रा कमी नहीं
पर शादी के बाद से ही मुझे लगता रहा जैसे सिर्फ ड्यूटी निभा रहा हो
उसके स्पर्श में उत्तेजना भरपूर है पर ऊष्मा नहीं ।

फिर जब नील से मिली 
तो कब उसके प्यार में डूबती चली गयी ,पता ही ना चला
नील के साथ ने वह सब दिया जो कबीर के साथ में अनुपस्थित था
नील का देखना ,छूना ,चूमना सब मुझे जैसे अपने साथ बहाए ले जाते हैं
नील से मिलकर लगा कि प्रेम कितनी बेसिक नीड है हमारे लिए

प्यार तो मैंने बहुत किया कबीर से
लेकिन किसी से प्यार पाना इतना सुंदर है मैं नहीं जानती थी
मैं डर गयी उस प्यार को खोने से
नील के लिए इतनी पजेसिव हो गयी कि
उसकी पसन्द जैसा बनने की कोशिश करने लगी
कैसे भी वह बना रहे मेरे साथ , कहीं छोड़ ना जाये 
एक असुरक्षा बोध घर कर गया मन में । 
नील के रंग में रंगी मैं कितना दोहरा जीवन जीने लग गयी हूँ। 

क्या प्रेम इतना मजबूर कर सकता है कि 
हम खुद की पसन्द के खिलाफ जाने लग पड़ें। 
कभी कभी डर लगता है कि नील मेरे इसी रूप को तो प्रेम नहीं करता ?

अब कबीर का स्पर्श मुझे अच्छा नहीं लगता
जैसे मन के साथ देह भी सिर्फ नील की हो 
कबीर के साथ प्यार करते हुए लगता है कि जल्द से यह सब बीत जाए
जैसे मुझे सिर्फ नील का स्पर्श ही भाता है
वैसे ही क्या नील भी अपनी पत्नी के साथ मजबूरी में सोता होगा ?
फोटो देखकर तो ऐसा लगा नहीं था। 

कभी कभी लगता है कि शायद कबीर भी किसी रिश्ते में है
जब बहुत डरते हुए अलग अलग कमरों में सोने की बात की तो झट से मान गया
पक्का तो नहीं पता मुझे पर लगता तो है कि उसकी जिंदगी में कोई और है
पर किस मुँह से पूछूं या सवाल उठाऊँ , जब खुद ही ईमानदार नहीं हूँ । 

कबीर है ,नील है, प्यारी बेटी है ,अच्छी नौकरी है 
पर सच कहूँ तो मैं खुश नहीं हूँ
झूठ कहते , अभिनय करते हुए दिन बीत रहे 
कबीर के सामने ऐसे एक्ट करती हूँ जैसे सब पहले जैसा हो
नील के सामने तो भावनाओं के सिवाय पूरा अस्तित्व ही नकली बना लिया है 
अनु और पम्मो के बीच झूलते मैं ' अनुपमा ' को तलाश करती हूँ 
जो कहीं नहीं मिलती अब मुझे।

सही गलत का द्वंद लगातार मेरे मन को मथता रहता है 
नील से मिलने की तड़प दिल से जाती नहीं कभी 
उसकी पत्नी से एक जलन अलग मन को कचोटती रहती है।

नील ने कहा है कि
वह कभी पत्नी को नहीं छोड़ेगा
मैं खुद भी बेटी की खातिर कबीर को नहीं छोड़ पाऊंगी
नील रोज़ घर पहुंचने के बाद और छुट्टी के दिन मुझसे बात ,मैसेज भी नहीं करता
मैं जानती हूँ कि 
अगर उसे कभी मुझमें और पत्नी में से किसी एक को चुनना पड़े
तो वह एक पल में मुझे छोड़ देगा। 

मुझे कभी ऐसा चुनाव करना पड़ा तो मैं क्या करूँगी ?
इसका जवाब नहीं है मेरे पास
मैं वक्त पर छोड़ती हूँ इसका फैसला 
और चलने देती हूँ ,जैसा चल रहा है
सारी उलझनों , बेचैनियों और गिल्ट के बावजूद।

अगर आज ईश्वर मुझसे कोई वरदान मांगने को कहें
तो मैं कहूँगी कि
मुझे वापस उन दिनों में जाना है 
जब मेरी ज़िंदगी में नील और कबीर दोनों ही नहीं थे। 

मैं सचमुच बहुत थक गई हूँ। बहुत ज़्यादा ......

-----पल्लवी त्रिवेदी

[ ' प्रेमी ,प्रेमिका और उनके वो' सीरीज़ की तीसरी कविता ]

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