प्रेमिका का पति-------------------------
हम अचानक ही मिल गए थे किसी समारोह में
मैं जानता था कि वह मेरी प्रेमिका का पति है
वह नहीं जानता था कि मैं उसकी पत्नी का प्रेमी हूँ
अलबत्ता यह जानता था कि मैं उसकी पत्नी का सहकर्मी हूँ
बड़े जोश से वह मिला
हमने एक टेबल पर बैठकर खाना खाया
आज वह पत्नी के बिना आया था
लेकिन उसकी पत्नी उसकी बातों में इस कदर उपस्थित थी
कि मुझे लगा नहीं कि वह नहीं आई है
'पम्मो ने एक दो बार आपका ज़िक्र किया था
अच्छे दोस्त हैं ना आप दोनों'
मैं ' पम्मो ' सुनकर चौंका
अनुपमा शाह यानी मेरी 'अनु' किसी की पम्मो भी है
दिल ने ज़ोर से धड़क कर मुझे इत्तिला किया
कि उसे अच्छा नहीं लगा
मैं पम्मो के बारे में वह सब सुन रहा था
जो मेरी अनु में नहीं था
मसलन अनु कितनी व्यवस्थित है
और पम्मो कितनी लापरवाह
अनु को संवर कर रहना कितना पसन्द
पम्मो इतनी बेखबर अपने आप से
कि इतवार को घर में बाल भी न बनाये
अनु को पसन्द है कॉफी
और पम्मो चाय की दीवानी
अनु को गुलाबी रंग पसन्द है और पम्मो नीले पर फिदा
पम्मो को उसका पति सुबह 8 बजे हिला-हिलाकर उठाता है
अनु उसे खुद से पहले जागी हुई मिलती है
अनु मेरी प्रेमिका और पम्मो उसकी पत्नी
एक नाम के दो हिस्सों की तरह एक इंसान के अस्तित्व के भी दो हिस्से
अनु मेरे दिल की तरह मेरी अपनी
और पम्मो मेरे लिए कितनी अजनबी स्त्री
मुझे याद आया कि अनु बिल्कुल मेरे जैसी है
व्यवस्थित ,कॉफी लवर , अर्ली राइज़र
और अपने वार्डरोब से हर बार गुलाबी चुनकर मुझसे मिलने आती
इतनी ज्यादा मेरे जैसी
जैसे हम दोनों ट्विन फ्लेम हों।
जबकि पम्मो बिल्कुल खुद के जैसी है
पति की पसन्द के ख़िलाफ़ जाती हुई, उससे झगड़ती हुई
अपने वह होने की घोषणा करती हुई जो वह है
बिना परवाह किये कि उसका पति उसके होने को स्वीकारता है या नहीं
जिसे पति इस कदर हंसकर सुना रहा है
जैसे अपने और पम्मो के गहन प्यार के बारे में बता रहा हो।
आइसक्रीम खाते हुए बड़ी ज़ोर से दांत झनझना उठा मेरा
दांत के पहले मेरे समूचे अस्तित्व में एक झनझनाहट शुरू हो चुकी थी
मुझे अपने सामने बैठे पम्मो के पति से ईर्ष्या हो आई
इसके सामने इसकी पत्नी कितनी असल है
मेरे सामने मेरी प्रेमिका एक कुशल अभिनेत्री
प्रेमी को खुश करने के लिए उसकी पसन्द जैसा बनने का अभिनय करती हुई
पम्मो नाम के एक बवंडर से जन्मों से दहक रहीं ट्विन फ्लेम भक्क से बुझ गईं ।
मुझे उस पल में पम्मो से मिलने की तलब हुई
जो उसके पति को हासिल थी बरसों से
क्या कुछ बरसों बाद मुझे भी पम्मो मिल जाएगी ?
क्या कुछ बरस पहले वह अपने पति की भी ' अनु ' थी ?
क्या मैं खुद जो अपनी पत्नी का ' कांत ' हूँ
अपनी प्रेमिका के ' नील ' जैसा ही हूँ
या मेरे नाम की तरह मैं भी दो हिस्सों में बंटा हूँ ?
मैं अपने तमाम द्वंदों के साथ एक नई ईर्ष्या भी लिये चला आया
कि मेरी प्रेमिका का पति कितना निर्द्वंद है
कि वह नहीं जानता कि उसकी पम्मो किसी की ' अनु' भी है
अगले दिन अनु के साथ कॉफी पीते हुए मैं पाता हूँ
कि मुझे पम्मो नाम की स्त्री से प्यार होने लगा है।
-------पल्लवी त्रिवेदी
[' प्रेमी प्रेमिका और उनके वो' सीरीज़ की पहली कविता ]
ये बताइए , इस सीरीज की कविताएं दोबारा एक-एक करके रोज़ पोस्ट की जाएं या एक साथ सारी कर दी जाएं ? 🤗
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