पति की प्रेमिका


-------------------

उस दिन पति के ऑफिस के गेट टूगेदर में मिली थी अनुपमा 
मल कॉटन की गुलाबी साड़ी पहने खूब सुंदर लग रही थी
मैं दूर बैठी देख रही थी अपने पति की प्रेमिका को ।

पहले एक बार मिले हैं हम 
कांत ने ही मिलवाया था
जब अचानक टकरा गयी थी अपने पति के साथ एक कैफे में 
नेवी ब्लू मिडी ड्रेस पहने हुए

तब कहाँ जानती थी मैं कि यह मेरे पति की प्रेमिका है
फिर एक रोज़ कांत की वाट्सएप चैट पढ़ ली गलती से
तब तो जान पाई कि 
मेरा कांत दो सालों से किसी अनु का नील भी है। 
तब मन तो बहुत किया कि घर में तूफान खड़ा कर दूं
और इस अनु के घर भी जाकर तमाशा कर दूं 
फिर जी चाहा कि कांत को छोड़ कर चली जाऊं 
या उसे ही जाने को कह दूं घर से 
ठंडे दिमाग से यह भी सोचा कि समझदारी से कांत से बात करूं । 

फिर जाने क्यों चुप रहना चुना
कह देने से उससे प्रेम करना तो बंद करेगा नहीं
अलबत्ता और सतर्क हो जाएगा
या रिश्ता तोड़ भी ले तब भी मन से कैसे निकालेगा उसे? 

और फिर कांत इतना ज्यादा कांत था मेरे साथ कि
अगर गलती से पता नहीं चलता तो यह बात शायद मैं कभी न जान पाती
कांत का मेरे प्रति ना प्रेम बदला , ना व्यवहार
प्रेम अब ना भी हो तो एक्टिंग तो बेमिसाल करता आया है पट्ठा
सोचती हूँ कि कोई और होने का अभिनय तो करते हैं लोग
पर खुद होने का अभिनय करना कितना कठिन होता होगा 
कैसे इतना पैशनेटली चूमता है अब भी .... 
शायद उसे इमेजिन करता हो
कांत नहीं जानता कि अब मैं किस किस को इमेजिन करने लगी हूँ  

ना जान गई होती असलियत तो 
उसके हर चुम्बन के साथ इसके प्यार में और और डूबती जाती। 
इग्नोरेंस इज़ रियली अ ब्लिस। 

उसका प्यार देखकर सोचती हूँ
कि क्या कोई दो लोगों से एक साथ प्रेम कर सकता है ?
अनु के साथ चैट में पूरा मजनूं है यह 
और मेरे साथ एकदम रांझा 
दिमाग घूम जाता है मेरा कि यह किसके साथ असल है ?

जो भी हो, मुझे फिर पहले जैसा प्यार नहीं रहा कांत से 
प्रेमी से एक पायदान ऊपर उठाकर उसे प्रेमी के साथ पति बनाया था
अब दो पायदान नीचे उतारकर पति की कुर्सी पर ला बैठाया
और सब गुडी-गुडी चलने दिया। 
बच्चे बड़े हो जाएं शायद तब छोड़ भी दूं इसे। 
अभी क्यों बिगाड़ लूँ मैं अपनी ( सुखी ?) गृहस्थी इस बारे में बात भी करके ?
मेरी भी ज़रूरतें हैं जो उससे पूरी होती हैं 
प्रैक्टिकल होना ही कभी-कभी बेस्ट ऑप्शन होता है

जब उस दिन गेट टूगेदर में अनुपमा दिखी 
मुझे नहीं थी कोई ख्वाहिश उससे मिलने की
पर वह खुद ही मेरे पास आ गयी और मुहब्बत से गले मिली
वह नहीं जानती कि मैं उसके बारे में जानती हूँ
इसलिए उसके चेहरे पर कोई झिझक नहीं थी मुझसे मिलते हुए,
पर होनी चाहिए थी
क्योंकि वह तो जानती थी ना कि वह मेरे पति से प्रेम करती है।

मुझसे ज्यादा सुंदर तो नहीं है अनुपमा, 
सैलेरी भी मेरी उससे ज़्यादा ही होगी 
समझदार लगती है , पर वो तो मैं भी कम नहीं
फिर क्यों कांत को यह पसन्द आई होगी ?
शायद बातें अच्छी करती हो या कोई और बात हो
या अ-कारण ही आ गयी होगी 
इसका पति भी कितना हैंडसम और कूल है
इसे कांत से प्रेम क्यों हुआ होगा ?
शायद कांत के सेंस ऑफ ह्यूमर पर मर मिटी होगी। 

कांत हम दोनों को कनखियों से देख रहा था
क्या सोच रहा होगा वह उस वक्त ?

मैं और अनुपमा औपचारिक बने रहे
वह सिर्फ अपने पति और बेटी के बारे में बात करती रही
जैसे उसके मन का चोर पकड़े ना जाने की पुरजोर कोशिश कर रहा हो

मुझे उसकी बातों में कोई दिलचस्पी नहीं थी 
मैं देख रही थी उसके चेहरे , बालों और देह को
जिसे कांत ने ना जाने कितनी बार छुआ होगा
जानती तो पहले से थी 
पर उस देह को सामने देखकर उन दोनों का प्रणय दृश्यमान हो उठा

समोसे में आई तेज़ मिर्च सीधे दिल मे जा उतरी 
अजीब सी ईर्ष्या और क्रोध से सुलग उठा मन
बड़ी ज़ोर से जी चाहा कि
अपने और कांत के कल रात हुए अंतरंग सम्बंध के बारे में उसे बताऊं 
और एक हज़ार सांप उसके सीने पर लोटा दूं 
पर कुछ कहा नहीं , मैं भी अभिनय में पक्की जो हो गयी हूँ ।
बस हमारी एनिवर्सरी पर मुझे चूमते कांत की फोटो को वॉलपेपर बनाकर मोबाइल सामने टेबल पर धर दिया।
उसने देखा था , जली होगी ज़रूर 
मैं अकेली क्यों जलूँ ? 
सबको बराबरी से जलना चाहिए । 
इस आग की लपट कांत तक भी पहुंचेगी। 

फिर मुझसे बैठा न गया
अनुपमा से वॉशरूम जाने का बोलकर मैं कट ली 

घर लौटते हुए मैंने पति से कहा ' नीलकांत ..चलो पान खाते हैं '
वह अपना पूरा नाम सुनकर एक पल को चौंका 
और पान की दुकान की ओर गाड़ी मोड़ दी
रास्ते में उसने हमेशा की तरह मेरे हाथ को अपने हाथ में लेकर गियर पर रख दिया
लगा जैसे हाथ पर हज़ारों बिच्छू रेंग गए 
मैंने अपना हाथ अलगाया और फोन देखने लगी
इसी हाथ से तो उस अनुपमा की बच्ची का हाथ भी पकड़ता होगा । 

'एक मीठा ,एक सादा पान' कांत ने पान वाले से कहा
'नहीं दोनों सादा पान लगाओ ' मैंने अपने पसंदीदा मीठे पान को खारिज किया 
कांत फिर चौंका पर कुछ बोला नहीं 

ढेर-सी सुपारी और कत्थे वाला कड़वा पान चबाते हुए 
मैंने खुद को उस नैतिक दबाव से पूरी तरह मुक्त कर लिया 
जो मुझे किसी और के प्यार में पड़ने से रोकता आया था अब तक।

---------पल्लवी त्रिवेदी

[ 'प्रेमी ,प्रेमिका और उनके वो' सीरीज़ की दूसरी कविता ]

Comments

Popular posts from this blog

मां मने धैर्य

मासिक परीक्षा

गुरूजी स्मृति