प्रेम तुम्हे यदि सुन्दर और बेहतर मनुष्य नहीं बनाता है तो वह सबकुछ है पर प्रेम नहीं है,यह पंक्ति मैंने कहीं पढ़ी थी। मैं यह दावे के साथ कहता हूं कि तुम्हारे साथ मैं बेहतर मनुष्य हुआ। तुमने मुझे हृदय से चाहा सराहा और मेरी कटु वचनों, उलाहनाओं को सुना और सहा फिर भी मुझे हमेशा खुश रखने का प्रयास किया, मैंने इसकी परवाह शायद ही कभी की। 
किसी को प्यार करना तुम्हें निर्मल और कारुणिक बनाता है पर किसी का प्यार पाना तुम्हें पवित्र और जिम्मेदार बनाता है। मैं सौभाग्यशाली हूँ कि मैंने तुम्हारा प्यार पाया। मैं तुम्हें कितना प्रेम करता हूँ या नहीं करता हूँ ये तुम पर छोड़ता हूँ फिर भी इतना तो सच है कि मैं तुम्हारी परवाह करता हूँ ,जीवन के उन कठिन क्षणों के प्रति आगाह करता हूँ जो मैंने लड़कियों के जीवन में देखें हैं... मेरी तो यही आकांक्षा रहेगी कि ताउम्र ऐसे कठिन पल तुम्हारे जीवन में न आएं और मेरी आशंकाएं गलत साबित हों।

स्वभाव से विद्रोही हूँ, समाज के इस बने बनाए ढांचे से मुझे अनेक शिकायतें रही हैं जो कभी कभी अनायास ही फूट पड़ती हैं जबकि तुम्हारा इसमें कोई दोष नहीं होता है।
जानते हो जब हम किसी से नफरत करते करते उसी के जैसे हो जाते हैं... ऐसा लगता है कि पितृसत्तात्मक व्यवस्था का विरोध करते करते कभी कभी मैं उसके ही जैसे हो जाता हूँ।
तुमसे काफी कुछ सीखा है मैंने , छोटे छोटे लम्हों में खुशियां तलाश करना, केयर करना , परवाह करना.. बातों विवादों को ऐसे भूल जाना कि जैसे हुआ ही न हो कुछ । तुमने कई बार मुझे आईना दिखाया कि मेरे कथनी और करनी में कितना फर्क है मतलब कि मैं चाहता हूँ कि जिस प्रकार से लोग मुझसे व्यवहार करें उस प्रकार से उनसे व्यवहार नहीं करता ।
ये मेरा दोहरा चरित्र है... कोशिश कर रहा हूँ कि ऐसे निजात पाऊं,ये बिलकुल अक्षम्य है ।

Comments

Popular posts from this blog

मां मने धैर्य

मासिक परीक्षा

गुरूजी स्मृति