उस पार

आओ प्रिय! उस पार चल के देखते हैं।

इस धरा पर अब न है अधिकार मेरा
रात्रि के आघात से व्यथित है सबेरा
भाग्य का सूरज वो डूबा जा रहा है
चाहता क्या है मेरी नियति का चितेरा?

इस नदी के अवस कूल अब नोचते हैं
आओ प्रिय उस पार चल के देखते हैं।।

मेरा प्रिय क्यों दूर मुझसे हो रहा है?
जाने किस संसार में वो खो रहा है
उसके दृग जल मेरे दृग से बह रहे हैं
थाम लो ना ,हो कर याची कह रहे हैं।।

अब सहज बाहुपाश क्यों कर घेरते है।
आओ प्रिय!उस पार चल कर देखते हैं।

क्रमशः

-अतुल पाण्डेय

Pic- captured by me and edited by someone😊

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