प्रिय
प्रिय! मुझे पहचान लेना,हाथ मेरा थाम लेना..
जब गगन का सूर्य जाकर तिमिर में डूबता हो
जब अकेला चाँद अलसायी नदी को चूमता हो
जब दिवा के स्वप्न आँखो में चटाचट टूटते हों
तब खड़े हो कर हिमालय से मुझे अंकवार देना
प्रिय! मुझे पहचान लेना...
जब मेरी आँखों के आगे दुःख की बदली छा रही हो
जिंदगी की रेत हाथों से फिसलती जा रही हो
प्रश्न अधरों पर ठहर कर राह अपनी भूल जायें
थाम कर आँखो से इनको उत्तरों की राह देना
प्रिय! मुझे पहचान लेना...
जब मेरे हाथों से मेरी प्रथम कविता जा चुकी हो
जब जीवन की निशा में सांस अंतिम आ गयी हो
जब कुहासा में किरण की आस का आभास ना हो
हाथ मेरे थाम कर तुम प्राण को आधार देना
प्रिय!मुझे पहचान लेना...
✍🏻 अतुल पाण्डेय
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