हम तुम

किस शून्य में हम तुम आकर खड़े हुए हैं?
तुम दिखते हो 
चंद कदम दूर
दिक् काल पर पसरे हुए

कुछ कदम बढाये मैंने 
तुम्हारी ओर
हर कदम ही पहले का आधा होता जाता है
ये कदम ही मेरी हिम्मत की दीवार की ईटे हैं
सांस की हर एक दफा गुजरने पर
उस दीवार की एक ना एक ईंट उखड़ जाती है

टुकड़े मेरी नाकामियों के
खड़े हैं आज भी
किसी प्रत्याशा में 
छू देते तो वे जीवंत हो उठते
मुकम्मल होने के लिये...

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