न्यायिक हत्या और बाहुबली तंत्र
सामान्यतः एनकाउंटर किया नही जाता अपितु दुर्भाग्य से हो जाता है......परन्तु यहाँ तो एनकाउंटर बा कायदे किया जा रहा।
यह खबर त्वरित रूप से सन्तोषजनक है।परन्तु यह पैटर्न सही नहीं।यह हमारे सडे हुए न्याय तंत्र और और न्याय प्रक्रिया में हुई देरी का परिणाम है कि लोग खुश भी हो रहे।लोग त्वरित न्याय होते देखना चाह रहे।
खाकी,अपराधी और खादी का गठजोड़ किसे नही पता?खादी, खाकी को प्रमोशन दिलावता और खाकी खादी को संरक्षण।इन दोनों को जोड़ने का काम करते अपराधी।
आज पुलिस इतनी आक्रामक तब हुई है जब अपराधी का हाथ खाकी के गिरेबान तक आया है।पिछले 20 सालों तक सब मौन थे।
और सबसे खतरनाक पैटर्न यह है कि विभिन्न जाति में जन्म लेने वाले दुर्दांत अपराधी अपने जाति के आन-बान-शान के प्रतीक बन जा रहे।इसके बाद अपराधी विशेषण केवल विधिक रजिस्टर में ही रह जाता।बाहर की दुनिया में ये " बाहुबली" नाम से संबोधित होते हैं।
आपने कभी सुना है क्या!
अपराधी राजा भैया,अपराधी अतीक अहमद,अपराधी ब्रजेश सिंह या फिर अपराधी हरि शंकर तिवारी?
नही,क्योकि इनके बाहुबल से खादी वोट बटोरती है और इसी खादी के लिए मीडिया नरेटिव सेट करती है।
पुलिस की हिंसा को हमारा समाज भी सेलिब्रेट कर रहा है। कानपुर में लोग नारे लगा रहे है।मिठाइयां बांट रहे हैं।ठीक उसी तरह जैसे आज से चार महीना पहले हैदराबाद में डॉक्टर की हत्या के आरोपी जो पकड़े गए थे, मारे गए।सबको पता था कि पुलिस ने मारा है। इसके लिए उन्हें हार पहनाया गया, माला पहनाया गया. ये बहुत दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति है। आप स्टेट के वायलेंस को रिकॉगनाइज कर रहे हैं। वैलिडेट कर रहे हैं और उसे रिस्पेक्टेबल भी बना रहे हैं। ये खतरनाक है।
अगर न्यायिक जांच मेँ यह एनकाउंटर फर्जी पाया जाता है तो गाज किस पर गिरेगी?
स्टेट पर?
उत्साहित जनता पर?
या DGP,IG,DIG पर?
या फिर उन बेचारे पुलिसवालों पर!
(पिछले फ़र्ज़ी पाये गये एनकॉउंटर के उदाहरण आपके पास हैं।)
मृतक पुलिस वालों के परिवार वालों के साथ मेरी गहरी संवेदनाएं हैं।
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