पिछले वर्ष, शिक्षा विभाग ने मासिक परीक्षाओं की एक महत्वाकांक्षी योजना लागू की थी, जिसका उद्देश्य छात्रों की शैक्षिक प्रगति को नियमित रूप से आँकना था। इसके तहत प्रत्येक कक्षा और विषय के लिए बोर्ड परीक्षा की तर्ज पर प्रश्न पत्र तैयार किए जाते थे। इन प्रश्न पत्रों को जिला स्तर से सभी स्कूलों तक पहुँचाने की व्यवस्था थी, लेकिन यह प्रक्रिया कई चुनौतियों और अव्यवस्थाओं से भरी थी, जिसने शिक्षकों, छात्रों, और स्कूलों के लिए कई कठिनाइयाँ पैदा कीं।प्रश्न पत्रों को जिला मुख्यालय से स्कूलों तक पहुँचाने की जिम्मेदारी शिक्षकों पर डाल दी गई थी। ये पेपर जिला स्तर से भेजे नहीं जाते थे; इसके बजाय, शिक्षकों को स्वयं जिला कार्यालय जाकर इन्हें लेना पड़ता था। यह कार्य अत्यंत श्रमसाध्य और समय लेने वाला था। शिक्षकों के सामने यह सवाल रहता था कि कौन जाए और कौन पेपर लाए। कई बार प्रधानाध्यापक स्वयं इस जिम्मेदारी को निभाते, तो कभी अन्य शिक्षकों को भेजा जाता। इस प्रक्रिया में शिक्षकों को कई समस्याओं का सामना करना पड़ता था। जिला कार्यालय में प्रश्न पत्रों के पैकेट अव्यवस्थित ढंग से रखे जाते थे। स्कूल-विशिष्ट पैकेट ढू...
कितनी बार सोचा है कि मां पर कुछ लिखूं, बारहा सोचा है,पर मां पर लिखना इतना आसान कहां है।अनेक बार कलम उठाई है, रख दी है। अनेक बार कीपैड खोला है बंद कर दिया है, कोई सिरा नहीं मिलता कि कहां से शुरू करूं, संघर्ष की गाथा का पहला शब्द ही मां है। टन टन की आवाज से नींद खुल गई है... अदरक कूटने की ध्वनि है। कूटते आवाज़ भी दे रही मुझे। अंगड़ाई ले कर उठ रहा हूँ, नेपथ्य से महामहिम पिताश्री के झाड़ू लगाने की खर खर के बैकग्राउंड म्यूजिक में की ध्वनि है कि “सुतले रह लो 12 बजे ले..“ । मैं समझ गया कि सात बज गया है। मजदूर भाई लोग आ गए हैं, निर्माण कार्य चल रहा है, इसलिए सबको और पहले उठना पड़ता है, क्योंकि नल पर वे भी बार बार आते हैं। पापा के लिए तुलसी अदरक मिर्च का काढ़ा तैयार हो गया है, समझ गया हूँ कि हलाहल का घूंट मुझे भी पीना पड़ेगा ही क्योंकि ज़ुकाम में पापा का खौफ है।मैं उठ के बाथरूम की ओर चल दिया हूँ।क्योंकि इसके बाद मम्मी अपने और मेरे लिए चाय बनाएगी। मम्मी की सत्तर की अवस्था में मैं इसे डिसाइड नहीं कर पाया कि मम्मी भोर में उठती है या मम्मी के उठने से भोर होती है।क्योंकि मम्मी ने बर्तन भी धुल लिए है...
यह अक्टूबर है,नहीं यह हरसिंगार का महीना है।सुबह से झमाझम बारिश हो रही है।दशहरा भी बारिश में धुल गया है। मैं सुबह से good morning के जवाब की प्रतीक्षा में हूं। पल पल पर इनबॉक्स चेक कर रहा हूं।उसका जवाब नहीं आया अब तक,हो सकता है समय न मिला हो,हो सकता है मूड ऑफ हो या ये भी हो सकता है कि कोई आस पास हो। हर एक अनुमान दूसरे अनुमान को काट दे रहा। एक गालिब का शेर याद आ रहा है कि "मोहब्बत में नहीं है फर्क जीने मरने में,उसी काफिर में मरते हैं कि जिस काफिर पर दम निकले"। घायल मन सहानुभूति खोजता है।लेकिन धीरे धीरे सहानुभूति का आदि हो जाता है तो अपने को घायल करने से भी परहेज नहीं करता।
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