प्रेम-अंकुर

उम्र की ढलती दोपहर में
उसके अंदर से फूटा प्रेम-अंकुर,
जैसे गूलर के फल में पनप रहा हो
गूलर का फूल।

जैसै अषाढ़ की कच्ची बरसात में
सहज ही फूट उठता है 
मिट्टी-धूल के नीचे दबा पड़ा स्नेह-बीज।

अंकुर जड़ें पहुँचीं
हृदय की अतलतम कंदराओं में,
जहाँ बिखरी पड़ी हैं
वय:संधि काल की उमंगो के टुकड़े ।

जड़ों ने सोखा
वर्जनाओं के पहाड़ तले दबे
अश्रु-स्वेद के अधकचरे जीवाश्म को,
अनायास ही साँसों में भरा
उलझती लटों में लिपटी बसंती हवाओ को,
पहन लिया नव-पल्लव 
उम्र की गाँठों पर सहज ही,
और उछाल दिया हथेलियों को आसमान के जानिब

मुठ्ठी में भर लिया बचा-खुचा आसमान,
उड़ते पंछीयों के झुण्ड में से
थाम लिया मचलकर
किसी भटकते पंछी का हाथ,
लगाये अनगिनत गोते साथ-साथ
सूरज की आड़ में...✍अतुल पाण्डेय

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