उसे उड़ने के लिये खुुुलआ आसमान चााहिये था फैलाने के लिए पंख मुझे बंद मुट्ठी का कोना जिसमें छिप सकूं दुनिया के झंझवातो से सुदूर घुप्प अंधकार में उसे चाहिए थी माघ की गुनगुनी धूप जहाँ करवट ले सके अल्हड़पन मुझे चाहिए था साँसो का कारोबार ताकि भर सकूं निश्चेष्ट लोगों की साँसे जो मसले हुए हैं खुद की लाशों तले उसे चाहिए था बेमौसम की बरसात जिसमें भींगो दे अपने सभी अनकहे सूखे जज्बात बिखेर दे दुख मे पगी हुई खुशियाँ मिट्टी की सोंधी सुगंध के वास्ते मुझे चाहिए था सभी सितारों की रौशनी जिससे भर दूं दुनिया के पृष्ठ में छिपे अंधेरों में जहाँ जमा की जा रही मक्कारियां उसे चाहिए था परिजात के फूलों की माला जिसे पहनाती अपने प्रियवर को अनायास ही उसके वक्षस्थल पर रखकर माथा मुझे चाहिए था उन करोड़ों भूखे पेटों की आंच जिसमें गलाता पैरों की बेड़ियां और ढालता अनगिनत सुनहरे सपने उसे पंसद था रात्रि के तीसरे पहर में सप्तम सुर मे विलापता वैरागी मुझे पसंद थी खारे चेहरे लिए वियोगी के प्रेम में पगी स्त्रियां हम मिले अ...
सामान्यतः एनकाउंटर किया नही जाता अपितु दुर्भाग्य से हो जाता है......परन्तु यहाँ तो एनकाउंटर बा कायदे किया जा रहा। यह खबर त्वरित रूप से सन्तोषजनक है।परन्तु यह पैटर्न सही नहीं।यह हमारे सडे हुए न्याय तंत्र और और न्याय प्रक्रिया में हुई देरी का परिणाम है कि लोग खुश भी हो रहे।लोग त्वरित न्याय होते देखना चाह रहे। खाकी,अपराधी और खादी का गठजोड़ किसे नही पता?खादी, खाकी को प्रमोशन दिलावता और खाकी खादी को संरक्षण।इन दोनों को जोड़ने का काम करते अपराधी। आज पुलिस इतनी आक्रामक तब हुई है जब अपराधी का हाथ खाकी के गिरेबान तक आया है।पिछले 20 सालों तक सब मौन थे। और सबसे खतरनाक पैटर्न यह है कि विभिन्न जाति में जन्म लेने वाले दुर्दांत अपराधी अपने जाति के आन-बान-शान के प्रतीक बन जा रहे।इसके बाद अपराधी विशेषण केवल विधिक रजिस्टर में ही रह जाता।बाहर की दुनिया में ये " बाहुबली" नाम से संबोधित होते हैं। आपने कभी सुना है क्या! अपराधी राजा भैया,अपराधी अतीक अहमद,अपराधी ब्रजेश सिंह या फिर अपराधी हरि शंकर तिवारी? नही,क्योकि इनके बाहुबल से खादी वोट बटोरती है और इसी खादी के लिए मीडिया नरेटिव सेट करती है। पुलिस क...
#episode9 अब मैं लॉर्ड मेकाले का वह मैकाले का बदनाम भाषण लिखने जा रहा हूँ, जो विकृत रूप में सोशल मीडिया में घूमता रहा है। हम ब्रिटिश इतिहास को तोड़-मरोड़ कर यह कहने के योग्य नहीं रहते कि उन्होंने तोड़ा-मरोड़ा। इसलिए, इसका मूल पाठ करना चाहिए। मैं यहाँ मुख्य अंशों का सरल अनुवाद लिख रहा हूँ। उसके बाद इसमें आपत्तियों पर चर्चा होगी। यह ‘मिनट्स ऑफ एजुकेशन’ है जो कलकत्ता में शिक्षाविद थॉमस मेकाले ने प्रस्तुत किया। “मुझे बताया गया कि यहाँ की शिक्षा 1813 के ब्रिटिश अधिनियम के तहत निर्धारित की गयी है, जिसमें कोई भी बदलाव संवैधानिक माध्यम से ही संभव है। फ़िलहाल एक ख़ास रकम साहित्य के प्रचार-प्रसार के लिए मुहैया की गयी है। यहाँ साहित्य का अर्थ वे तमाम संस्कृत और अरबी ग्रंथ हैं। मैं पूछता हूँ, क्या यहाँ के लोगों को मिल्टन की कविताएँ और न्यूटन की भौतिकी नहीं पढ़नी चाहिए? क्या वे कुश-घास से देवताओं की पूजा करना ही सीखते रहेंगे? अगर हम मिस्र का उदाहरण लें, तो वहाँ भी कभी समृद्ध सभ्यता थी। अब वे कहाँ हैं? क्या उन्हें भी आदि काल के चित्रलेख (हीरोग्लिफिक्स) ...
Comments
Post a Comment