उम्र
उम्र कुछ खिंची खिंची सी लगती है
बनावटी हाव भाव
चेहरे पर पुती वरिष्ठता की परिभाषा
ड्रेस कोड की खड़ी पंक्तियाँ
मोटे लेंसों के परिधि पर खड़ा खड़ा
देखता हूँ मैं,
सबकुछ पीछे जाते हुए
सिमटे हुए बचपन को
कैशोर्य का विद्रोह को
और समाज के नजरो से दबे वर्तमान को
आईने लगाये चेहरों में अपना प्रतिबिम्ब
उदास व धुँधला नज़र आता है।
मेरे वजूद के टुकड़ों की अठखेलिया
मेरे किरदार को खण्डित करती हैं
आँखे चमक उठती हैं
जिम्मेदारियां सर पर सवार होती हैं
और जिन्दगी चल पड़ती है।।
✍️अतुल पाण्डेय
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