टूट कर बिखरना
#टूट_कर_बिखरना
कल मौसम कुछ सर्द था
चाय की चुस्कियां रवानी पर थी
बातें तो नहीं थी
कुछ भी नहीं था
तुम भी नहीं थे
हाथ बिन छुए लौट के चले आये
लौटे प्रबल आवेग से तुम्हारी तरफ
मुट्ठियों में भींच लेने को
सर्प की भांति लिपट जाने को
कुछ भी नहीं था
बातें भी नहीं थी
फिर भी तुम मुझमें करवट बदल रहे थे...
फिर एक मगरूर हवा का झोंका आया
खिड़की पर रखा कप कांप उठा
हिल गया वजूद उसका
आखिर टूट ही गया गिर कर
और भी बहुत कुछ टूट गया
कप के साथ साथ
वो भरम भी वो आशा भी
जो मुझे हम होने की तसल्ली देता था ।
किरचे बिखरे पड़े थे
आसमान की ओर मुँह बाये
अब यादें करवट बदल रही थी। ----------------------------यायावर
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