पृथ्वी दिवस:एक आलेख

#पृथ्वी_दिवस_पर_विशेष_आलेख

आज मैं दृश्यमान ब्रह्मांड के सुपरक्लस्टर के, वीगो सुपर क्लस्टर के, लोकल आकाशगंगा समूह में स्थित मंदाकिनी आकाशगंगा की ओरियन भुजा में स्थित सौर मंडल के, पृथ्वी नामक ग्रह पर स्थित एशिया महाद्वीप के, भारतीय उपमहाद्वीप के मध्य में भारतवर्ष नामक देश में उपस्थित, उत्तर प्रदेश नामक राज्य के अंत में एक देवरिया जनपद के पुच्छ पर स्थित सलेमपुर तहसील के केंद्र में अवस्थित #श्री_रैनाथ_ब्रम्हदेव_स्नातकोत्तर_महाविद्यालय_सलेमपुर की #शिक्षा_संकाय में कुर्सी पर बैठा हुआ,यह लिख लिख रहा हूं।
 हमारी आकाशगंगा का 100000 प्रकाश वर्ष वर्ष व्यास  तथा 3000 प्रकाश वर्ष मोटी सर्पिलाकार संरचना है। हमारा सूर्य इसके केंद्र से 26000 प्रकाश वर्ष की दूरी पर स्थित है तथा 250 किलोमीटर प्रति सेकेंड की दर से आकाशगंगा के केंद्र की परिक्रमा कर रहा है ।जबकि एक प्रकाश वर्ष में 95.5 खरब किलोमीटर के बराबर होता है।
कितना विशालकाय है हमारा ब्रह्माण्ड!इसी अकाशगंगा की ओरियन भुजा में स्थित सौर मण्डल के एक ग्रह पृथ्वी पर जीवन उत्पन्न हुआ था।वह जीवन आज से करीब 400 करोड़ वर्ष पूर्व हुआ था। विभिन्न भौतिक व जैव रासायनिक क्रियाओं के फलस्वरूप सागर की तलहटी में पहली बार एक कोशिकीय जीवन प्रारंभ हुआ जो करोड़ों वर्षों में क्रमिक विकास द्वारा एककोशिकीय से बहुकोशिकीय रूप में बदलकर; मत्स्य,उभयचर,सरीसृप तथा अंत में स्तनपायी जीव में परिवर्तित हुआ। स्तनपायी जीव क्रमिक विकास द्वारा चिंपैंजी, बंदर तथा अंत में मानव के रूप में विकसित हुए। यह मानव प्रजाति भोजन तथा आवास की खोज में पूरे विश्व भ्रमण को निकल पड़ी।मानव प्रजाति के भी ऑस्ट्रेलियोपिथकस,निएण्डरथल,होमोइरेक्टस, हैबिलिस, होमोसेपियंस जैसे अनेक पड़ाव रहे।होमो सेपियंस ने दुर्दम साहस दिखाते हुए हर प्राकृतिक आपदा-विपदाओं को झेलते हुए डार्विन की 'योग्यतम की उत्तरजीविता' के सिद्धांत को चरितार्थ करते हुए पृथ्वी पर एकछत्र राज करने में सफल रहे। दस हजार वर्ष पहले हम मानवों ने खेती करना शुरू किया और आज विभिन्न पड़ाओं से गुजरते हुए वैज्ञानिक में प्रवेश कर चुके हैं।पहिया और आग की खोज के बाद भाप की शक्ति से शुरू कर परमाणु ऊर्जा के शक्ति पर नियंत्रण पाकर अतीत की असंभव संभावनाओं को संभव बना कर प्रकृति विभिन्न रहस्यों को जान लिया है।परमाणु ऊर्जा का सबसे बड़ा प्रमाण वायेजर-प्रथम यान सन् 1977 में ब्रह्माण्ड के भ्रमण पर निकला था। आज हमसे 2200 सौ करोड़ किलोमीटर दूर जा चुका है। मानव की इस विज्ञान यात्रा को रोकते हुए एक कहानी सुनाता हूं जो मैंने विजय राज शर्मा की पुस्तक 'महामानव' में पढ़ी थी।
आज से करीब 5 सदी पूर्व मेक्सिको देश के समुद्री तट पर समुद्री जहाजों का एक बड़ा बेड़ा पहुंचा। वहां एक आज्टेक नामक सभ्यता शैशवावस्था में थी।वहां के लोगों के लिए आधुनिक मानव का समुद्री बेड़ा कौतूहल का केंद्र बन गया।यह समुद्री बेड़ा स्पेन का था जिसका कैप्टन था हर्नान कॉर्टेज।अज्टेक निवासियों को लगा कि यह ईश्वरीय दूत है जो सितारों की दुनिया से आया है। उन्होंने इस बेड़े के सैनिकों की विविध प्रकार से सम्मान और स्वागत करने की कोशिश की। वहां की सभ्यता अभी कांस्ययुगीन में ही थी जो ना तो इस स्पेनिश सिपाहियों की भाषा समझ रही थी नाही इनके इरादे उनके सारे प्रयोजन विफल रहे लगभग 500 सैनिकों की मुट्ठी बरसे ना भर सेना जो आधुनिक गोला बारूद हथियार से लैस थी ने उस सभ्यता के भोले भाले पत्थर के हथियार वाले विशाल साम्राज्य को तहस-नहस कर दिया भीषण नरसंहार हुआ खून की नदियां मां चली करीब 200000 लोगों 500 लोगों की लिप्सा और क्रूरता के सामने प्राण उत्सर्ग कर दिया और वह ठीक सभ्यता वही जमींदोज हो गई। मानव ने विभिन्न जीवों के अस्तित्व को मिटाते दमन करते हुए एक शब्द रचा मानवता परंतु आज मान हो मानव स्वयं के बनाए शब्द के शब्द के अस्तित्व पर ही संकट खड़ा कर दिया है रस्टम। जिस प्रमाण व्यक्तियों के इस्तेमाल से दुनिया में भौतिक समृद्धि सुख शांति की स्थापना की जा सकती थी उस परमाणवीय शक्ति की सहायता से सृष्टि के  विध्वंस के लिए अनेक विध्वंसकारी आयुध इकट्ठे कर लिए हैं। आज दुनिया बारूद के ढेर पर खड़ी है ।पिछली सदी में साम्राज्यवाद की भूख ने पूरी मानव सभ्यता के अस्तित्व पर संकट खड़ा कर दिया था।आज पूरी दुनिया नस्लवाद,आतंकवाद,भाषावाद,सम्प्रदायवाद,सीमा-विवाद,पंथवाद,पूँजीवाद,साम्यवाद इत्यादि की आग में झुलस रही है।
प्राकृतिक संसाधनों का अन्धाधुन्ध दोहन,पर्यावरण की कीमत पर विकास,नदियों के अविरल प्रवाह को रोकने हेतु बाँध,नाभिकीय परीक्षण,हरित गृह गैसों का अनवरत उत्सर्जन ने,औद्योगिक कचरे ने इस सुन्दर नीले ग्रह को तबाही के मुहाने पर लाकर खड़ा कर दिया है।महान वैज्ञानिक अल्बर्ट आइंस्टीन ने एक बार कहा था कि "मैं नहीं जानता कि तृतीय विश्व युद्ध किन हथियारों के दम पर लड़ा जायेगा लेकिन यदि तृतीय विश्वयुद्ध होता है तो चतुर्थ विश्व युद्ध कुल्हाड़ी और डण्डे से लड़ा जायेगा।"
हालांकि यह बात बीसवीं सदी के पूर्वार्ध में कही गई थी।लेकिन मैं आज यह कहना चाहता हूँ कि अगर विश्वयुद्ध हुआ तो पृथ्वी तो जीवन की समाप्ति तय है।
 14 फरवरी 1990 में महान वैज्ञानिक कार्ल सागन की सलाह पर वायजर यान छः अरब किमी दूर से हमारे पृथ्वी की तस्वीर खिंची गई।इतनी दूर से पृथ्वी दस बाई दस मीटर के पर्दे पर एक धुंधले सिक्के के जैसे दिखाई दी।यह धब्बा इस विराट ब्राह्माण्ड में हमारी लघुता को प्रदर्शित करने के लिए काफी था।उस चित्र को देखकर कार्ल सागन ने जो कहा था वही संदेश मैं आप सभी पाठकों को सुनाना चाहता हूँ।
"यह वो धब्बा है जहाँ हर वह इंसान जिसे आप जानते हैं या नहीं जानते हैं।हर वह इंसान जो भूत काल में पैदा हुआ या भविष्य काल में पैदा होगा,उन सभी इंसानों के जीवन की कहानी सिर्फ और सिर्फ इसी रौशनी के धब्बे पर लिखी जायेगी।कोयल की सुरीली बोलियाँ,मासूम बच्चों की निश्छल किलकारियां और हमारे दुखों की सिसकियाँ सिर्फ इसी ग्रह पर गूँजती हैं।दुनिया के सभी अच्छे बुरे आदमी,साधु-संत,पापी और भ्रष्ट राजनेता,युद्ध में गये सैनिकों की बाट जोहती प्रियतमायें,अपने संतानों का पेट भरने के लिए तपती दुपहरी में भूखी सोती नन्हीं जानें और गरीबों के खून-पसीने की कमाई के दम पर अपने आलीशान बंगलों में आरामदेह विस्तरों पर सोते लोग केवल और केवल इसी दुनिया में पाये जाते हैं।दुनिया का हर गीत,शेर ओ शायरी,बिजनेस प्रस्ताव,छुट्टी के लिए दिये गये प्रार्थना-पत्र,वैज्ञानिक,किताबें तथा मज़हब-पंथ के नाम पर खून की नदियाँ बहाने वाली किताबें सिर्फ और सिर्फ इसी धब्बे पर लिखी गयी हैं।
अतः आइये हम सब मिल कर इस सुन्दर नीले ग्रह के अस्तित्व को बरकरार रखते हुए अपना सह-अस्तित्व सुरक्षित करने का संकल्प लें।
(पुरानी पोस्ट)
✍ अतुल पाण्डेय

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