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डायरी

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इरफान खान याद आते हैं जिन्होंने कहा था कि आखिर में सब कुछ छोड़ देने का ही नाम जिंदगी है....। कितनी बोझिल होती जा रही हैं शामें. सुबहे होती हैं, दिन चढ़ता है शाम होती है फिर रात हो जाती है। धीरे धीरे सब छूटता जा रहा, इरफान खान याद आते हैं जिन्होंने कहा था कि आखिर में सब कुछ छोड़ देने का ही नाम जिंदगी है....। कितनी बोझिल होती जा रही हैं शामें। सुबहे होती हैं, दिन चढ़ता है शाम होती है फिर रात हो जाती है। धीरे धीरे सब छूटता जा रहा। जो सबसे प्रिय थे वो सबसे दूर हुए। जिनका अस्तित्व मेरे अन्दर गुंथा हुआ था पता नहीं कब के वे  निकल गए थे, अचानक से लगा कि वे हैं ही नहीं।  जिनकी एक एक बात मायने रखती थी, अब उनके होने न होने के ही मायने नहीं हैं। जिनसे घण्टों बातें हो जाए तो भी मन नहीं भरता था उनसे सेकेण्डों में ही बातें खतम हो जाती हैं। डायल नम्बर के रहने वाले नम्बर कॉन्टैक्ट लिस्ट में कहीं पड़े हैं। जिनके दुःख मेरे दुःख थे,उनके दुःख मुझे छू तो लेते हैं पर दुःखी नहीं कर पाते। जिनसे मिलने के लिए बहाने ढूंढता नहीं पड़ता था वाजिब कारण होते थे,वे मिल जाते हैं तो एक बहाने गढ़ लिए ज...

संवाद (कविता)

- स-संवाद ------------------- १- मैंने पूछा सबसे मुलायम क्या है? उसने कहा स्त्री का मन मैंने फिर पूछा और सबसे मजबूत? उसने कहा स्त्री का मन २- मैंने कहा प्रतीकों, उदाहरणों, और संदर्भों में बात करना भी कितना सुंदर है ना? उसने मुझे कुछ नहीं कहा बस हल्के से छुआ बिना किसी प्रतीक, उदाहरण, और संदर्भ के! ३- मैंने पूछा तितली अधिक सुंदर है या फूल? उसने कहा उनका मिलना ४- मैंने पूछा? इस समस्त ब्रम्हांड का केंद्र कहाँ है? उसने कहा हमारी यह पृथ्वी तो फिर पृथ्वी का? हर वो जगह जहाँ स्त्री है अच्छा तो फिर स्त्री का? उसने कहा उसकी नाभि ५- मैंने पूछा सबसे सुंदर संगीत? उसने कहा मौन मैंने पूछा सबसे दुर्लभ राग? उसने कहा प्रेम मैंने पूछा सबसे बड़ा सुख? उसने कहा अतृप्ति मैंने पूछा सबसे पहला संबंध? उसने कहा दृष्टि  मैंने पूछा ईश्वर कौन है? उसने थोड़ा ठहर कर मुझे देखा और फिर मुस्कुरा कर कहा  यह घड़ी, यह पल, यह क्षण। --

अनाधिकार चेष्टा और प्रायश्चित

आज तुम बैंक गई थीं, बैंक खाते से लिंक फ़ोन नंबर बदलवाने के लिए। मैं हमेशा तुम्हें प्रेरित करता रहा हूँ कि इस तरह के काम स्वयं करने की आदत डालो—चाहे बैंक का काम हो, कोई फ़ॉर्म भरना हो या कहीं प्रवेश लेना हो। यह अच्छी बात होती है कि हम ऐसे कार्यों के लिए किसी अन्य व्यक्ति पर निर्भर न रहें। मेरी आदत रही है कि प्रत्येक लड़की—चाहे वह मेरी मित्र हो, संबंधी हो या मेरी छात्रा—उसे अपना काम स्वयं करने के लिए प्रेरित करूँ। एक बार फ़ॉर्म भरने को लेकर भी तुमसे बहस हो गई थी। मुझे तनिक भी अच्छा नहीं लगता कि स्त्रियाँ इन कार्यों के लिए पुरुषों पर आश्रित रहें। किसी आपात स्थिति में उन्हें कठिनाई का सामना न करना पड़े और वे अपना काम स्वयं करके आत्मगौरव का अनुभव कर सकें। भले वे स्वयं न करें, पर कम से कम उन्हें यह तो पता होना चाहिए कि ये सब काम कैसे होते हैं। वे लोगों से मिलें, उनसे बात करें, और आवश्यकता पड़ने पर अपना काम कह सकें। मैं हमेशा इस दिशा में उनकी सहायता भी करता हूँ। आज मुझे एक नया सबक मिला। जब तुम बैंक में थीं, तब मैंने तुम्हें फ़ोन किया था और एक काम दिया था कि पता करके आना कि सेविंग अकाउंट को...

मूंछें

मेरे पिता की ऊँची नाक थी इतनी ऊँची कि चाय के गिलास में डूब जाया करती थी जिन पर हँस पड़ती थी  घर की बच्चियाँ,  उनके पिता की भी नाक भी ऊँची थी ऐसा दादी बताती हैं, जिनके रौबदार मूंछो से बिना डरे घर की बच्चियाँ खेलती थी बचपन में बच्चियाँ बड़ी होती गईं  उनके साथ साथ बढ़ती गई उनकी मूंछे भी मूंछें बढ़ती गई जैसे बढ़ती है अमरबेल  बच्चियां बढ़ कर लड़कियां हो गईं  और मूंछें बढ़ कर इज्ज़त   मूंछें बरगद बनी जिसके नीचे पली किसी पीले पौधे के जैसे बच्चियाँ  अपने हिस्से का आकाश ढूंढ रहीं आज भी

the wait

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मैंने कभी एक फिल्म देखी थी,उसकी कहानी अच्छे से याद नहीं आ रही थी, उसमें एक प्रेग्नेंट लड़की और एक बूढ़ा आदमी थे। शायद वे एक बस स्टॉप पर मिले थे, बुजुर्ग व्यक्ति को लास्ट में लड़की लेकर बस से चली जाती है। बड़ा भावुक सा दृश्य था।बस  कहां ले गई उनको? आज मुझे याद आया कि कौन सी फिल्म थी,कब देखा था... उस लड़की की क्या कहानी थी ? क्यों दुखी थी। मन बेचैन हो गया। बहुत सोचा पर याद नहीं आया फिर मैने दिमाग पर जोर डाला कि उसका नाम याद आए तो उसे फिर देखूं फिर अंततः चैटजीपीटी की शरण में गया ... वहां भी बहुत देर यही प्लॉट डाल कर खोजा पर नहीं मिला... मुझे पता नहीं क्यों लग रहा था कि या तो ये काफ्का की कहानी है या कोई रशियन कहानी या फिल्म है। अलग अलग prompt देकर खोजा, इसी चक्कर में मेटामोर्फोसिस जैसी कालजयी कहानी फिर से पढ़ गया ,बहुत मुश्किल से इसने खोजा कि यह एक शॉर्ट फिल्म सह मानसिक रोग जैसे आटिज्म, डिमेंशिया जागरूकता अभियान से संबंधित थी। और नाम था The wait... फिर देखा इसे तल्लीनता से। पूरी कहानी कुछ इस प्रकार है कि एक गर्भवती महिला बस स्टॉप पर बैठी है। चेहरे पर चिंता साफ़ दिख रही है।...
प्रेम तुम्हे यदि सुन्दर और बेहतर मनुष्य नहीं बनाता है तो वह सबकुछ है पर प्रेम नहीं है,यह पंक्ति मैंने कहीं पढ़ी थी। मैं यह दावे के साथ कहता हूं कि तुम्हारे साथ मैं बेहतर मनुष्य हुआ। तुमने मुझे हृदय से चाहा सराहा और मेरी कटु वचनों, उलाहनाओं को सुना और सहा फिर भी मुझे हमेशा खुश रखने का प्रयास किया, मैंने इसकी परवाह शायद ही कभी की।  किसी को प्यार करना तुम्हें निर्मल और कारुणिक बनाता है पर किसी का प्यार पाना तुम्हें पवित्र और जिम्मेदार बनाता है। मैं सौभाग्यशाली हूँ कि मैंने तुम्हारा प्यार पाया। मैं तुम्हें कितना प्रेम करता हूँ या नहीं करता हूँ ये तुम पर छोड़ता हूँ फिर भी इतना तो सच है कि मैं तुम्हारी परवाह करता हूँ ,जीवन के उन कठिन क्षणों के प्रति आगाह करता हूँ जो मैंने लड़कियों के जीवन में देखें हैं... मेरी तो यही आकांक्षा रहेगी कि ताउम्र ऐसे कठिन पल तुम्हारे जीवन में न आएं और मेरी आशंकाएं गलत साबित हों। स्वभाव से विद्रोही हूँ, समाज के इस बने बनाए ढांचे से मुझे अनेक शिकायतें रही हैं जो कभी कभी अनायास ही फूट पड़ती हैं जबकि तुम्हारा इसमें कोई दोष नहीं होता है। जानते हो जब हम किसी से नफर...
हंसते हंसते कहीं चुप हो जाता हूँ मैं... बात शुरू होती हाल चाल से, फिर बातें घर परिवार पर आती हैं। भइया ये कह रहे y, दीदी ये कह रही थे....पापा इस बात पर क्रोधित थे, मम्मी इस बात पर चिंतित थी। इन्हीं बातों के गुच्छों में, मेरी अपनी बातें आती हैं, मेरे अनुभव आते हैं जिनके वज़ह से कभी कभी कड़वाहट भरी आलोचनाएं भी सामने आती हैं। फ़िर दोनों " मैं "में उलझते हैं.... कि मैं ऐसा या मेरे घर ऐसा होता है। फिर उसमें से ही कोई बात चुभ जाती है किसीको।इसके बाद लड़ाईयां झगड़े हो जाते हैं। इसके बाद शुरू होता है चुप्पियों का दौर... लम्बे लम्बे बिल्कुल paused calls.. जिसमें होता है हूँ, हाँ, और सब, ठीक है, बढ़िया... क्योंकि मेरी शब्द निरस्त हो जाते हैं जब मुझे अपनी भावनाएं व्यक्त करनी हों ,.. मुझे अपने दुःख खुशी प्रेम व्यक्त करने के लिए शब्द नहीं होते,उनके पास ये कला है, उन्हें दुनिया की बातों से कोई मतलब नहीं.. उन्हें अपनी या अपने लोगों की बातों से मतलब होता है, जिसमें मैं भी हूँ। मेरा मूड किसी नेता अभिनेता या किसी अधिकारी के बेहूदा बयान पर दिन भर के लिए खराब हो सकता है,उनका मूड किसी फूल के खिल ...

पति की प्रेमिका

------------------- उस दिन पति के ऑफिस के गेट टूगेदर में मिली थी अनुपमा  मल कॉटन की गुलाबी साड़ी पहने खूब सुंदर लग रही थी मैं दूर बैठी देख रही थी अपने पति की प्रेमिका को । पहले एक बार मिले हैं हम  कांत ने ही मिलवाया था जब अचानक टकरा गयी थी अपने पति के साथ एक कैफे में  नेवी ब्लू मिडी ड्रेस पहने हुए तब कहाँ जानती थी मैं कि यह मेरे पति की प्रेमिका है फिर एक रोज़ कांत की वाट्सएप चैट पढ़ ली गलती से तब तो जान पाई कि  मेरा कांत दो सालों से किसी अनु का नील भी है।  तब मन तो बहुत किया कि घर में तूफान खड़ा कर दूं और इस अनु के घर भी जाकर तमाशा कर दूं  फिर जी चाहा कि कांत को छोड़ कर चली जाऊं  या उसे ही जाने को कह दूं घर से  ठंडे दिमाग से यह भी सोचा कि समझदारी से कांत से बात करूं ।  फिर जाने क्यों चुप रहना चुना कह देने से उससे प्रेम करना तो बंद करेगा नहीं अलबत्ता और सतर्क हो जाएगा या रिश्ता तोड़ भी ले तब भी मन से कैसे निकालेगा उसे?  और फिर कांत इतना ज्यादा कांत था मेरे साथ कि अगर गलती से पता नहीं चलता तो यह बात शायद मैं कभी न जान पाती कांत का मेरे प्रति ना ...

पत्नी का प्रेमी

---------------------- पांडे के भाई की शादी में मिल गया था नीलकांत  अकेला आया था , मैं भी अकेला ही था तो सोचा आज पम्मो के प्रेमी से गुफ्तगू कर ही ली जाए वह बेचारा नहीं जानता कि मुझे सब पता है  पम्मो को इतना ज्यादा जानता हूँ मैं कि उसके जीवन में आई छोटी से छोटी तब्दीली मुझसे छुपी नहीं रह सकती पम्मो का नील मेरे सामने बैठा था बढ़िया टक्सीडो पहनकर कितना सहज था मेरे सामने !  वेल स्पोकन , चार्मिंग , गज़ब का ह्यूमर  ऐसे लफ़ंडर तो किसी को भी अपने प्यार में फांस लें फिर पम्मो ठहरी सीधी सादी ,आ गयी होगी बातों में।  कॉलेज टाइम में काफी प्ले किये हैं मैंने आज अभिनय कला आजमाने का टाइम आया था  अपनी चिढ़ को सीने में दबाते हुए मैं उससे बड़े जोश से मिला  आज वह मौका हाथ आया था जिसकी मुझे कब से प्रतीक्षा थी अपने और पम्मो के बारे में इसे बताकर इसे राख कर देने की पम्मो पम्मो कर के मैंने इसके कान से खून निकाल दिया पम्मो इसके सामने कैसे सज संवर कर जाती है इसकी पसन्द के रंग पहनती है इसके हिसाब से सारे काम करती है घर में 8 बजे से पहले ना जागने वाली पम्मो  टूर पर जाते ही सुबह 6...

प्रेमिका का पति-------------------------

हम अचानक ही मिल गए थे किसी समारोह में  मैं जानता था कि वह मेरी प्रेमिका का पति है वह नहीं जानता था कि मैं उसकी पत्नी का प्रेमी हूँ  अलबत्ता यह जानता था कि मैं उसकी पत्नी का सहकर्मी हूँ बड़े जोश से वह मिला हमने एक टेबल पर बैठकर खाना खाया आज वह पत्नी के बिना आया था  लेकिन उसकी पत्नी उसकी बातों में इस कदर उपस्थित थी कि मुझे लगा नहीं कि वह नहीं आई है 'पम्मो ने एक दो बार आपका ज़िक्र किया था अच्छे दोस्त हैं ना आप दोनों'  मैं ' पम्मो ' सुनकर चौंका अनुपमा शाह यानी मेरी 'अनु' किसी की पम्मो भी है  दिल ने ज़ोर से धड़क कर मुझे इत्तिला किया कि उसे अच्छा नहीं लगा मैं पम्मो के बारे में वह सब सुन रहा था जो मेरी अनु में नहीं था मसलन अनु कितनी व्यवस्थित है और पम्मो कितनी लापरवाह अनु को संवर कर रहना कितना पसन्द  पम्मो इतनी बेखबर अपने आप से  कि इतवार को घर में बाल भी न बनाये  अनु को पसन्द है कॉफी और पम्मो चाय की दीवानी  अनु को गुलाबी रंग पसन्द है और पम्मो नीले पर फिदा पम्मो को उसका पति सुबह 8 बजे हिला-हिलाकर उठाता है अनु उसे खुद से पहले जागी हुई मिलती है  अनु म...

प्रेमी की पत्नी

---------------------- कितनी खूबसूरत है नील की वाइफ  चमकदार सांवली रंगत , बड़ी-बड़ी आंखें और दिलफ़रेब मुस्कान चंदेरी की इंडिगो साड़ी में बहुत ग्रेसफुल लग रही थी जब उस दिन ऑफिस की पार्टी में दूर कोल्ड ड्रिंक लिए बैठी थी  बीच बीच में हमारी नज़रें टकरा जा रहीं थीं  पर उसकी नज़र तक मुझे देख नहीं मुस्कुराई थी  जबकि हम एक बार मिल चुके थे पहले बहुत देर तक मैं सोचती रही कि खुद जाकर उससे मिलूं या नहीं ?  एक झिझक सी हो रही थी  मन का गिल्ट बहुत उलझनें पैदा करता है फिर लगा कि  नहीं मिलूंगी तो कहीं इसे मेरे और नील के बारे में शंका ना हो जाये मैं गयी तो थी उसके पास सिर्फ हाय हेलो करने पर जाने क्यों उसे हग कर बैठी  उसके स्पर्श में आत्मीयता बिल्कुल नहीं थी बल्कि उसकी मुस्कान भी मुझे नकली लगी शायद कुछ तो जानती है ये .... वैसे नील कहता तो है कि पत्नी को कुछ नहीं पता  मगर मैं एक स्त्री होने के नाते दूसरी स्त्री को जितना जान सकती हूँ उतना कोई पति भी अपनी पत्नी को नहीं जान सकता। मैंने नर्वसनेस में पति और बच्ची की बातें सुनाना शुरू कर दिया वह हां हूँ कर रही थी पर शायद स...

कैमूरडायरी

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#कैमूरडायरी  (प्रस्तावना) मेरे समूह में कुछ परम मित्र हैं, कुछ भाई हैं, कुछ दोस्त हैं, कुछ सहकर्मी हैं, लेकिन इनमें से मेरा एक भाई है और एक भतीजा है, दोनों भयंकर प्रकार के घुमक्कड़ प्रवृत्ति के हैं। मेरी कोई भी लंबी छुट्टी देखते हैं, तुरंत योजना बना डालते हैं। अगर उनकी छुट्टी और मेरी छुट्टी मेल खाती है और घर पर रह जाते हैं, तो हम सब अफसोस करते हैं कि काश कहीं घूम आए होते। एक दिवसीय यात्रा यहां हो सकती थी या द्विदिवसीय यात्रा यहां हो सकती थी। इन सबों के पास गाड़ी है और ५जी इंटरनेट है, तो जितनी देर में मैगी बनती है, उतनी देर में एक यात्रा की योजना कर देते हैं। सारी योजना इन्हीं की होती है, बस मुझे संयोजक बनाए रखते हैं। मेरा हाल राष्ट्रपति का होता है, जो बिना मंत्रिपरिषद की सलाह के कुछ कर ही नहीं सकता और मंत्रिपरिषद की सलाह को मानने से इनकार भी नहीं कर सकता। पिछले साल की मिर्जापुर की पहाड़ियों की यात्रा, लखनिया दरी का जलप्रपात बड़ी मजेदार और रोमांचक रही थी। तभी से यह योजना बन रही थी कि कहीं और घूमने चला जाए। लगभग १ साल बाद कई बार योजना बनते-बिगड़ते एक योजना अंतिम हुई कि कैमूर की पहाड़...

तुम्हारे बाद

तुम्हारे जाने के बाद मैं हकबका गया हूँ  जिसे तुम्हारी भाषा में कुछ कहते होंगे मैं वैसा हो गया हूँ  जैसा ट्रेन छूटने के बाद पहुँचा यात्री जो मुँह खोल के अवाक देख सकता है उसे किसी प्रिय की अर्थी उठने के बाद पहुंची नवेली बहू  जो सुबक सकती है घूंघट में बिन देखे हुए, गेट बंद होने के बाद पहुंचा परीक्षार्थी; जो सुन सकता है परीक्षा की सन्नाटे का शोर।

मां मने धैर्य

कितनी बार सोचा है कि मां पर कुछ लिखूं, बारहा सोचा है,पर मां पर लिखना इतना आसान कहां है।अनेक बार कलम उठाई है, रख दी है। अनेक बार कीपैड खोला है बंद कर दिया है, कोई सिरा नहीं मिलता कि कहां से शुरू करूं, संघर्ष की गाथा का पहला शब्द ही मां है। टन टन की आवाज से नींद खुल गई है... अदरक कूटने की ध्वनि है। कूटते आवाज़ भी दे रही मुझे। अंगड़ाई ले कर उठ रहा हूँ, नेपथ्य से महामहिम पिताश्री के झाड़ू लगाने की खर खर के बैकग्राउंड म्यूजिक में की ध्वनि है कि “सुतले रह लो 12 बजे ले..“ । मैं समझ गया कि सात बज गया है। मजदूर भाई लोग आ गए हैं, निर्माण कार्य चल रहा है, इसलिए सबको और पहले उठना पड़ता है, क्योंकि नल पर वे भी बार बार आते हैं। पापा के लिए तुलसी अदरक मिर्च का काढ़ा तैयार हो गया है, समझ गया हूँ कि हलाहल का घूंट मुझे भी पीना पड़ेगा ही क्योंकि ज़ुकाम में पापा का खौफ है।मैं उठ के बाथरूम की ओर चल दिया हूँ।क्योंकि इसके बाद मम्मी अपने और मेरे लिए चाय बनाएगी। मम्मी की सत्तर की अवस्था में मैं इसे डिसाइड नहीं कर पाया कि मम्मी भोर में उठती है या मम्मी के उठने से भोर होती है।क्योंकि मम्मी ने बर्तन भी धुल लिए है...

खुला आसमान

________________________ उसे खुला आसमान चाहिए था फैलाने के लिए पंख मुझे बंद मुट्ठी का कोना जिसमें छिप सकूं  दुनिया के झंझवातो से सुदूर घुप्प अंधकार में  उसे चाहिए थी माघ की गुनगुनी धूप जहाँ करवट ले सके अल्हड़पन  मुझे चाहिए था साँसो का कारोबार ताकि भर सकूं निश्चेष्ट लोगों की साँसे जो मसले हुए हैं खुद की लाशों तले उसे चाहिए था बेमौसम की बरसात  जिसमें भींगो दे अपने सभी अनकहे सूखे जज्बात बिखेर दे दुख मे पगी हुई खुशियाँ  मिट्टी की सोंधी सुगंध के वास्ते मुझे चाहिए था  सभी सितारों की रौशनी जिससे भर दूं दुनिया के पृष्ठ में छिपे अंधेरों में जहाँ जमा की जा रही मक्कारियां उसे चाहिए था परिजात के फूलों की माला जिसे पहनाती अपने प्रियवर को अनायास ही उसके वक्षस्थल पर रखकर माथा मुझे चाहिए था  उन करोड़ों भूखे पेटों की आंच जिसमें गलाता पैरों की बेड़ियां  और ढालता अनगिनत सुनहरे सपने  उसे पंसद था रात्रि के तीसरे पहर में  सप्तम सुर मे विलापता वैरागी मुझे पसंद थी खारे चेहरे लिए  वियोगी के प्रेम में पगी स्त्रियां  हम मिले अनायास व सहज ही क्षितिज और आस...

माँ के पिता

माँ के पास बहुत बाते हैं। वह बहुत कुछ कहना चाहती है,उसकी बातें गुलर के फूल जैसी हैं, उसकी हर बात में से फूटती हैं, सौ बातें.. . उसकी हर बात में नाना मुख्य किरदार होते हैं। ऐसा लगता है कि माँ को वर्षों से सुना नहीं गया। माँ के गुजारे बचपन से लेकर कैशोर्य तक का समय, उसकी अमिट धरोहर है। उसे तनिक फ़र्क नहीं पड़ता कि उसकी बातें हँसी में उड़ाई जाएंगी  तंज कसे जाएंगे  या अनसुना कर दिया जाएगा  उसे बस सुनाने में सुख है। वह मस्तिष्क में विंबित चित्रों से शब्द झरते रहते हैं  उसे खुश देखने का मतलब है कि उसे कुछ सुनाते हुए देखना। पिता के साथ गुजारे हुए पचास साल बहुत हल्के हैं नाना के साथ गुजारे हुए 20 सालों के सामने। उसकी हर कहानियों के मुख्य किरदार उसके पिता हैं, जिनकी तुलना वह रोज़मर्रे के जीवन में रोज करती है  अपनी कट रही जिंदगी का विस्तार  अपने जिए हुए जीवन में ढूंढती है।  

मासिक परीक्षा

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पिछले वर्ष, शिक्षा विभाग ने मासिक परीक्षाओं की एक महत्वाकांक्षी योजना लागू की थी, जिसका उद्देश्य छात्रों की शैक्षिक प्रगति को नियमित रूप से आँकना था। इसके तहत प्रत्येक कक्षा और विषय के लिए बोर्ड परीक्षा की तर्ज पर प्रश्न पत्र तैयार किए जाते थे। इन प्रश्न पत्रों को जिला स्तर से सभी स्कूलों तक पहुँचाने की व्यवस्था थी, लेकिन यह प्रक्रिया कई चुनौतियों और अव्यवस्थाओं से भरी थी, जिसने शिक्षकों, छात्रों, और स्कूलों के लिए कई कठिनाइयाँ पैदा कीं।प्रश्न पत्रों को जिला मुख्यालय से स्कूलों तक पहुँचाने की जिम्मेदारी शिक्षकों पर डाल दी गई थी। ये पेपर जिला स्तर से भेजे नहीं जाते थे; इसके बजाय, शिक्षकों को स्वयं जिला कार्यालय जाकर इन्हें लेना पड़ता था। यह कार्य अत्यंत श्रमसाध्य और समय लेने वाला था। शिक्षकों के सामने यह सवाल रहता था कि कौन जाए और कौन पेपर लाए। कई बार प्रधानाध्यापक स्वयं इस जिम्मेदारी को निभाते, तो कभी अन्य शिक्षकों को भेजा जाता। इस प्रक्रिया में शिक्षकों को कई समस्याओं का सामना करना पड़ता था। जिला कार्यालय में प्रश्न पत्रों के पैकेट अव्यवस्थित ढंग से रखे जाते थे। स्कूल-विशिष्ट पैकेट ढू...

विद्यालय में एक दिन

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सुबह की हल्की ठंड के बीच जब मैं स्कूल पहुँचता हूँ, तो बच्चों की चहल-पहल शुरू हो चुकी होती है। कुछ बच्चे स्कूल के गेट के पास खड़े गप्पें मार रहे होते हैं, तो कुछ बिना जूते-चप्पल के मैदान में दौड़ लगा रहे होते हैं। उनके कपड़े धूल से सने होते हैं, यूनिफॉर्म के बटन टूटे हुए या गायब होते हैं—या तो खेल-खेल में या किसी झगड़े में। मैं कक्षा में पहुँचता हूँ और उपस्थिति रजिस्टर खोलता हूँ। नाम पुकारता हूँ, लेकिन कई बच्चे गायब हैं। यह कोई नई बात नहीं है। बहुत से बच्चे सिर्फ नाम लिखवाकर गायब हो जाते हैं—कुछ दिन आते हैं, फिर महीनों तक नहीं दिखते। परीक्षा के समय भी कुछ बच्चों को कोई दिलचस्पी नहीं होती, जैसे यह उनके लिए कोई मायने ही नहीं रखती। रोज होमवर्क के लिए चिल्लाता हूँ।चार पांच लड़कियां और एक या दो लड़कों को छोड़ कर पूरी कक्षा नील बट्टे सन्नाटा में रहती है।कुल इकहत्तर बच्चों में से तीस ये चालीस उपस्थिति रहती है।जब भी होम वर्क के लिए कहो सब चुप, "क्यों, होमवर्क क्यों नहीं किया?" "सर, समय नहीं मिला," "घर में काम था," "किताब नहीं है," कोई यह नहीं कहता कि ...

चेन्नई डायरी

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चेन्नई डायरी अन्तिम 6 (दो साल पहले) यात्रा का अंतिम दिन है।हमलोग ऊटी से वापस आ गए हैं। चेन्नई रेलवे का सहायक स्टेशन है पेरंबूर, यहीं से शाम को संघमित्रा एक्सप्रेस पकड़नी हैं , सुबह सुबह ही पहुंचे हैं यहां। यहां का स्टेशान स्वच्छ है, लेकिन शौचालय एक ही है और गंदा है। फ्रेश होकर, मैं और अंशु दोनों चाय के लिए बाहर निकले हैं। एक चाय की टीटपरी दिखी है। चाय बनाने का तरीका कुछ अलग सा है चाय पत्ती को पानी में उबाल के रखा है, दूध और पानी अलग ही उबाल के रखा है। जिसे गिलास में डाल कर फिर उबली चाय के पानी को mix करते हैं, अंत में स्वादानुसार शक्कर मिला कर दे देते हैं। चाय और बिस्कुट ले कर हम लोग फिर स्टेशन पर आ गए हैं। अंशु काफी केयरिंग लड़का है। हमलोगों का अपना टूरिस्ट गाईड भी है। नेट पर आसपास घूमने वाली जगह खोजा जा रहा है। एक राजीव गांधी मेमोरियल दिखा रहा और इक कोई विवेकानंद जी से संबन्धित कोई जगह, एक चार्जिंग प्वाइंट देखकर हम लोग वो जगह छेका लिए हैं। आराम से बैठ कर स्टेशन पर चारो तरफ देख रहा हूं  । धीर धीरे लोग आ रहे। चारो ओर भोजपुरी में बात करते लड़कों को देख कर मन खुश हो गया ह...
■बहुत दूर मत जाया करो / पाब्लो नेरूदा  बहुत दूर मत जाया करो, एक दिन के लिए भी नहीं, क्योंकि — क्योंकि मैं नहीं बता सकता तुम्हें, भीतर की प्रत्यक्षानुभूति दिन काफ़ी तनता जाता है, और मैं तुम्हारी प्रतीक्षा करता हूँ इस तरह; जैसे कि किसी ख़ाली स्टेशन पर करता हूँ प्रतीक्षा — किसी और ही जगह ठहरी हुई उस रेलगाड़ी की खो दिया है जिसने, अपने गन्तव्य का होश बेवक़्त मुझे छोड़ कर कभी मत जाना, प्राण ! एक घण्टे के लिए भी नहीं, वेदनाओं का वह तुहिन कण दौड़ता है साथ, वह धुआँ जो तलाशता है अपना घर बह जाता है मेरे भीतर, भटकता हुआ इस हृदय को अवरुद्ध कर ओह ! तुम्हारा छायाचित्र कभी न घुल पाए समुद्री तटों के ऊपर तुम्हारीं पलकें कभी न फड़फड़ाएँ देखकर के यह तन्हा फ़ासले एक सैकेण्ड के लिए भी मुझे छोड़कर मत जाओ !!! क्योंकि,       वह लम्हा जब तुम जा चुकी      होगी मुझे छोड़कर      मैं दिग्भ्रमित होकर,      यह पूछता हुआ,       लगाता रहूँगा      पृथ्वी के ऊपर चक्कर —   तुम क्या मिलोगी मुझे फिर वापिस ?   या इस हालत म...